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श्लोक 1.6.122  |
न यान्त्य् अनशनात् प्राणास्
त्वन्-नामामृत-सेविनाम्
परं शुष्क-महारण्य-
दावाग्निर् भविता गतिः |
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| अनुवाद |
| जो भक्तगण आपके नामरूपी अमृत का रसास्वादन करते हैं, वे भूख से नहीं मरते; अपितु उनका अन्त किसी विशाल शुष्क वन में आग लगने से होता है। |
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| Those devotees who taste the nectar of Your name do not die of hunger; rather, their end comes when a fire breaks out in a vast dry forest. |
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