श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  1.5.91 
सभायां श्री-सुधर्मायां
सुखासीनान् यथा-क्रमम्
निज-सौन्दर्य-भूषाढ्यान्
पारिजात-स्रग्-आचितान्
 
 
अनुवाद
उन्होंने उन्हें सुधर्मा नामक धन्य सभाभवन में सुखपूर्वक बैठे देखा। महत्व के क्रम में, वे अपनी शारीरिक सुन्दरता के आभूषणों से शोभायमान थे और पारिजात की मालाओं से भी सुशोभित थे।
 
He saw them sitting comfortably in the blessed assembly hall called Sudharma. In order of importance, they were adorned with ornaments of physical beauty and also decorated with garlands of Parijata.
तात्पर्य
पाठ 91 से 96 तक यदुओं के वैभव का वर्णन करते हैं। नारद ने पाया कि यदु शासक सुधर्मा कक्ष में एकत्रित हुए थे, जो मूल रूप से इंद्र के स्वर्गीय राज्य के थे। हालाँकि, यदुओं के अंतर्गत सुधर्मा का गौरव बढ़ गया था। अब, स्वर्गलोक में रहते हुए और भी अधिक, यह भाग्य की सर्वोच्च देवी लक्ष्मी देवी के वैभव और अनुग्रह, श्री की अभिव्यक्ति थी।

ईर्ष्या और क्षुद्र प्रतिद्वंद्विता से मुक्त, यदु आयु के क्रम में खुशी-खुशी बैठे थे। यद्यपि वे सभी शानदार ढंग से अमीर और शक्तिशाली थे, फिर भी उन्हें किसी भी भौतिक वस्तु की कोई इच्छा नहीं थी। जीवन में उनका खजाना उनके राजवंश का पुरस्कार था, श्री कृष्ण। उन्होंने राज-पाठ को केवल इसलिए स्वीकार किया क्योंकि ये कृष्ण की सेवा के लिए उपयुक्त थे और उन्हें आनंद देते थे। स्वर्गीय हॉल सुधर्मा और अमूल्य रत्न, वस्त्र, और पारिजात की मालाओं ने उनके पारलौकिक शरीरों की प्राकृतिक सुंदरता में कुछ भी नहीं जोड़ा, जो कृष्ण के लिए और एक दूसरे के लिए उनके शुद्ध प्रेम के वैभव के साथ चमकते थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)