ईर्ष्या और क्षुद्र प्रतिद्वंद्विता से मुक्त, यदु आयु के क्रम में खुशी-खुशी बैठे थे। यद्यपि वे सभी शानदार ढंग से अमीर और शक्तिशाली थे, फिर भी उन्हें किसी भी भौतिक वस्तु की कोई इच्छा नहीं थी। जीवन में उनका खजाना उनके राजवंश का पुरस्कार था, श्री कृष्ण। उन्होंने राज-पाठ को केवल इसलिए स्वीकार किया क्योंकि ये कृष्ण की सेवा के लिए उपयुक्त थे और उन्हें आनंद देते थे। स्वर्गीय हॉल सुधर्मा और अमूल्य रत्न, वस्त्र, और पारिजात की मालाओं ने उनके पारलौकिक शरीरों की प्राकृतिक सुंदरता में कुछ भी नहीं जोड़ा, जो कृष्ण के लिए और एक दूसरे के लिए उनके शुद्ध प्रेम के वैभव के साथ चमकते थे।
