श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  1.5.89 
तद् याहि तस्य परम-प्रिय-वर्ग-मुख्यान्
श्री-यादवान् निरुपम-प्रमदाब्धि-मग्नान्
तेषां महत्त्वम् अतुलं भगवंस् त्वम् एव
जानासि तद् वयम् अहो किम् उ वर्णयेम
 
 
अनुवाद
इसलिए, भगवान के परम प्रिय पार्षदों, दिव्य यादवों के दर्शन करो, जो आनंद के विशाल, अद्वितीय सागर में डूबे रहते हैं। हे प्रभु नारद, आप भली-भाँति जानते हैं कि वे कितने महान हैं। मैं आपको उनकी महिमा के बारे में क्या बताऊँ?
 
Therefore, visit the divine Yadavas, the most beloved associates of the Lord, who are immersed in a vast, unparalleled ocean of bliss. O Lord Narada, you know very well how great they are. What can I tell you about their glory?
तात्पर्य
नारद, कुंती कहती है, यादवों को देखने के लिए द्वारका जाना चाहिए, उनकी भक्ति के उदाहरण का पालन करना चाहिए और उनके संग की दया प्राप्त करनी चाहिए। वे भगवान के सभी श्रेष्ठ भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं, जिसमें ब्रह्मा और स्वर्गीय ग्रहों में अन्य देवता, वैकुण्ठ के गरुड़ और अन्य पारषद, और प्राहाद, हनुमान और मनुष्यों के संसार में अन्य वैष्णव शामिल हैं। कुंती सोचती है कि चूंकि यादव परमानंद में लीन हैं, इसलिए नारद का परमानंद निश्चित रूप से उनकी संगति में बढ़ेगा। हालाँकि, कुंती और पाण्डवों के साथ रहने से केवल उसे दुख में ही धकेला जाएगा।

इस मामले में अगर नारद यह सुझाव देते हैं कि वह कुंती और उसके बेटों से यादवों के बारे में सुनकर ही पर्याप्त संतुष्टि प्राप्त कर सकते हैं, तो कुंती उसे याद दिलाती है कि वह पहले से ही द्वारका के निवासियों को पाण्डवों से बेहतर जानते हैं। चूंकि नारद कई बार द्वारका जा चुके हैं, तो कुंती उसे ऐसा क्या बता सकती है जो वह पहले से नहीं जानता? उसे बस द्वारका जाना चाहिए, जहाँ वह कृष्ण की पूरी दया देख सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)