| श्री बृहत् भागवतामृत » खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार » अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त) » श्लोक 84 |
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| | | | श्लोक 1.5.84  | स चाधुनात्मनो ’न्येषाम्
अपि गेहेषु सर्वतः
स्त्रीणां निहत-बन्धूनां
महा-रोदन-संश्रुतेः
मनस्य् अपि पदं जातु
न प्राप्नोति कियन् मम | | | | | | अनुवाद | | परन्तु अब यह विचार मेरे मन में कभी नहीं आता कि कृष्ण मुझ पर दयालु हैं, क्योंकि सर्वत्र, हमारे घर में तथा हमारे पड़ोसियों के घरों में, मैं उन स्त्रियों का विलाप सुनता हूँ जिनके सम्बन्धी मारे गए हैं। | | | | But now the thought that Krishna is kind to me never comes to my mind, because everywhere, in our house and in the houses of our neighbors, I hear the lamentations of women whose relatives have been killed. | | ✨ ai-generated | | |
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