यथा हृषीकेश खलेन देवकी
कंसेन रुद्धाति-चिरं शुचारपिता
विमोचिताहम च सहआत्मजा विभो
त्वयेवनाथेन मुहुर विपद्-गणात
`` हे हृषीकेश, इन्द्रियों के स्वामी और भगवानों के भगवान, आपने मुझे और मेरे बच्चों को और आपकी माँ, देवकी, जो लंबे समय तक ईर्ष्यालु राजा कंस द्वारा बंदी और परेशान थी, को लगातार आने वाले खतरों से मुक्त किया है।
विषान महाग्नेः पुरुषाद-दर्शनद
असत-सभाया वन-वास-कृच्च्रताः
मृधे मृधे ऽनेक-महा-रथास्त्रो
द्रौण्य-अस्त्रतश्चास्म हरे ऽभिरक्षित
`` मेरे प्रिय कृष्ण, आपकी भगवत्ता ने हमें एक जहरीली केक से, एक महान आग से, नरभक्षकों से, शातिरों की सभा से, जंगल में निर्वासन के दौरान आने वाली पीड़ाओं से और उस लड़ाई से, जहां महान सेनापतियों ने लड़ाई लड़ी, से बचाया है। और अब आपने हमें अश्वत्थामा के हथियार से बचाया है। (भागवत 1.8.23-24)
यहाँ श्रीमती कुंती कहती हैं कि देवकी पर कृष्ण की दया उन पर कृपा से अलग है। कृष्ण ने देवकी को कंस के उत्पीड़न से बचाया, लेकिन देवकी के लंबे समय तक कैद रहने के बाद ही। इसके अलावा, उन्होंने देवकी को केवल एक बार ही रिहा किया था, और वह मुक्त होने के बाद भी दुखी थी क्योंकि कृष्ण ने अपने पहले छह बेटों को कंस की हत्या से नहीं बचाया था। लेकिन कृष्ण ने कुंती को उनके बेटों के साथ बार-बार बचाया। कृष्ण हमेशा उनकी सहायता के लिए बिना देरी किए आए - जब दुर्योधन ने भीम को एक जहरीला केक खिलाने की कोशिश की, जब दुर्योधन ने पाण्डवों को लाख से बने एक महल में जिंदा जलाने की कोशिश की, तब जब भाइयों को हिडिम्बा जैसे आदमखोर राक्षसों का सामना करना पड़ा, जब जुए में कौरवों ने उन्हे धोखा दिया, और कई अन्य मौकों पर। देवकी के पास कृष्ण के अलावा अन्य रक्षक भी थे, जिनमें उनके पति और अन्य वृष्णि नायक शामिल थे, जबकि कुंती के लिए कृष्ण ही एकमात्र आश्रय थे। इसलिए कुंती ने कृष्ण पर अपनी निर्भरता को अधिक पूर्ण माना।
