श्री परीक्षित बोले: माता कुन्ती, जिनके लिए कृष्ण का दर्शन ही जीवन था, दुःख से व्याकुल हो उठीं, उन्हें स्मरण हो आया कि कैसे कृष्ण ने कभी कृपा की थी और कभी नहीं। फिर वे आँखों में आँसू भरकर, करुण स्वर में बोलीं।
Sri Parikshit said: Mother Kunti, for whom the sight of Krishna was life itself, was overcome with grief. She remembered how Krishna had sometimes shown mercy and sometimes not. Then, with tears in her eyes, she spoke in a pitiful voice.
तात्पर्य
अपने पुत्रों और उनकी पत्नियों की तरह कुंती एक पारलौकिक आत्मा है, जो कृष्ण की पूर्ण कृपा से धन्य है। यह सत्य है, चाहे वह कुछ भी कहे। अलगाव का परमानंद, विप्रलम्भ-भाव, उसे दुखी होकर विलाप करने के लिए प्रेरित करता है जैसे कि वह एक साधारण महिला हो। परीक्षित महाराज यहाँ अपने विवरण को "शोकर्ता इव", यानी "विलाप करने की तरह" कहकर परिभाषित करते हैं, ताकि वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करने में मदद मिल सके।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥