श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.5.81 
तद् अस्तु दूरे दौर्भाग्यान्
मम पूर्व-वद् अप्य् असौ
नायात्य् अतो दया कास्य
मन्तव्या मयका मुने
 
 
अनुवाद
फिर भी, यह मेरा दुर्भाग्य है कि वे अब यहाँ नहीं आते। तो फिर, हे ऋषिवर, मैं कैसे मान लूँ कि उन्होंने मुझ पर कोई दया की है?
 
Yet, it is my misfortune that he no longer comes here. So then, O great sage, how can I believe that he has shown me any mercy?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)