यो ब्रह्म-रुद्रादि-समाधि-दुर्लभो
वेदोक्ति-तात्पर्य-विशेष-गोचरः
श्रीमान् नृसिंहः किल वामनश् च
श्री-राघवेन्द्रो ’पि यद्-अंश-रूपः
अनुवाद
ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य देवताओं के लिए भी, उच्च ध्यान अवस्था में भी, उन्हें अनुभव करना कठिन है। उन्हें वेदों के शब्दों के माध्यम से तभी जाना जा सकता है जब कोई उनके विशेष अर्थ को समझ ले। श्रीमान नृसिंह, श्री वामन और श्री राघवेंद्र उनके पूर्ण अंश हैं।
Brahma, Rudra, and other deities are difficult to perceive, even in a highly meditative state. They can only be known through the words of the Vedas when one understands their specific meaning. Sriman Narasimha, Sri Vamana, and Sri Raghavendra are His absolute manifestations.
तात्पर्य
श्री कृष्ण, जो अधिकतम मादक और अलौकिक व्यक्ति हैं, उन्हें समझना ही कठिन है। महान् देवता भी सैद्धांतिक रूप से उनकी सर्वोच्चता जानते हैं, परन्तु कृष्ण-प्रेम का स्वाद लेना शुरु भी नहीं कर सकते। सभी वैदिक ग्रन्थ अंततः श्री कृष्ण का वर्णन करते हैं, किन्तु उनका सर्व आकर्षक आकर्षण न तो वैदिक मंत्रों के शाब्दिक अर्थ में स्पष्ट है और न ही उनके अनुष्ठानिक विवेचन में। हमें वैदों के गुप्त उद्देश्य को पता लगाना होगा, जो कि श्री कृष्ण के शुद्ध भक्तों की दया से ही संभव है। ज्ञानी अतत्-निरसन की प्रक्रिया का पालन करते हैं, जिसमें वे सभी अनावश्यक अवधारणाओं को नकारते हुए परम को धीरे-धीरे उनके अवैयक्तिक रूप में प्राप्त करते हैं; परन्तु भगवान के व्यक्तित्व की अधिक गोपनीय समझ प्राप्त करने के लिए यह नेति-नेति विधि अपर्याप्त है। वैष्णव सर्वोच्च ब्राह्मण को उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं में पूजते हैं। वे अलग-अलग समय पर उन्हें अवतार नृसिंह, वामन, रामचंद्र आदि के रूप में पूजते हैं। प्रत्येक वैष्णव के पास भगवान का अपना पसंदीदा रूप है, उनका इष्ट-देव है। भले ही भगवान नृसिंह भयावह हैं और क्रोधित होने को तत्पर हैं, उनके बहुत सारे भक्त हैं, जो लगातार यह याद करते हैं कि कैसे उन्होंने प्रह्लाद की देखभाल की और उन्हें सभी खतरों से बचाया। भगवान वामन भी लोकप्रिय हैं, भले ही वे बौने हैं; उनके भक्त याद करते हैं कि कैसे उन्होंने तीन कदमों से ब्रह्मांड को ढक लिया और बलि को अपना सार्वभौमिक रूप दिखाया। लाखों सालों से अनगिनत भक्त भगवान रामचंद्र का सम्मान करते रहे हैं, एक आदर्श सम्राट के रूप में उनके उदाहरण को याद करते हुए। परन्तु इन सभी अवतारों का आकर्षण श्री कृष्ण के सर्वोच्च आकर्षण का केवल एक प्रतिबिंब है। आखिरकार, भगवान के सभी अवतार उनके आंशिक विस्तार हैं। उनमें से प्रत्येक परम व्यक्ति है जो पूर्ण रूप से शक्तिमान है, परन्तु उनमें से कोई भी उनकी शक्ति के सभी पहलुओं को प्रदर्शित नहीं करता है। केवल श्री कृष्ण ही ईश्वर की महिमा को पूरी तरह से प्रकट करते हैं। किला ("निश्चित रूप से") शब्द द्वारा नारद बताते हैं कि ईश्वर के रूपों में कृष्ण की प्रधानता एक सर्वविदित तथ्य है, जिसे शास्त्रों द्वारा स्थापित किया गया है। विशेष रूप से, श्रीमद्-भागवतम (1.3.28) घोषित करता है: एते चामश-कलाह पुम्सः कृष्णस्तु भगवान स्वयं "ये सभी अवतार परम व्यक्ति के भाग हैं, और उनके भागों के भाग हैं, परन्तु कृष्ण भगवान के मूल व्यक्तित्व हैं। कृष्ण भगवान नृसिंह, भगवान वामन और भगवान राघवेंद्र से श्रेष्ठ हैं, और इसलिए पांडव श्री प्रहलाद, बलि और हनुमान से श्रेष्ठ हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥