श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 66-67
 
 
श्लोक  1.5.66-67 
भीष्म-द्रोणादि-हननान्
निवृत्तं मां प्रवर्तयन्
महा-ज्ञानि-वरः कृष्णो
यत् किञ्चिद् उपदिष्टवान्

यथा-श्रुतार्थ-श्रवणाच्
छुष्क-ज्ञानि-सुख-प्रदम्
महा-दुःख-कृद् अस्माकं
भक्ति-माहात्म्य-जीविनाम्
 
 
अनुवाद
जब मैंने भीष्म, द्रोण आदि को मारने से इनकार कर दिया, तो श्रेष्ठ विद्वान कृष्ण ने मुझे कुछ ऐसा सिखाया जिससे मैं आगे बढ़कर उनका वध कर सकूँ। कृष्ण की शिक्षा का केवल शाब्दिक अर्थ सुनकर शुष्क विद्वान प्रसन्न हो सकते हैं, किन्तु हम जैसे लोगों को, जिनका जीवन और आत्मा शुद्ध भक्ति की महिमा में निहित है, भगवान के ये उपदेश अत्यंत कष्टदायक हैं।
 
When I refused to kill Bhishma, Drona, etc., the great scholar Krishna taught me something that would enable me to go ahead and kill them. Dry scholars may be pleased to hear only the literal meaning of Krishna's teachings, but for those of us whose life and soul are immersed in the glories of pure devotion, these teachings of the Lord are extremely painful.
तात्पर्य
उपनिषदें वैदिक ज्ञान के सार को संप्रेषित करती हैं, और श्रीमद् भगवद-गीता उपनिषदों के सार को व्यक्त करती है। विभिन्न श्रेष्ठ ऋषि प्रत्येक उपनिषद के ग्राही, या ऋषि, बने, लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने अपनी गीता को सीधे अपने मित्र और भक्त अर्जुन से बोलना चुना। क्योंकि अर्जुन खुद को महान समझने के लिए बहुत विनम्र हैं और कृष्ण द्वारा पांडवों को छोड़ने से निराश हैं, इसलिए वह खुद को कृष्ण का पसंदीदा भक्त नहीं मानते हैं। इसलिए वह गीता के पारलौकिक मूल्य को नकारने की कोशिश करता है। हालाँकि, यह केवल नारद को विचलित करने के लिए एक चाल है; यहाँ अर्जुन का तर्क मान्य नहीं है। भगवद-गीता में कृष्ण शुद्ध भक्ति सेवा सिखाते हैं, और उन्होंने इसे अर्जुन से इसलिए बोलना चुना क्योंकि अर्जुन उनके सबसे शुद्ध भक्तों में से एक हैं:

सर्वोपनिषदो गावो

दोग्धा गोपाल-नन्दनः

पार्थो वत्सः सु-धीर भोक्ता

दुग्धं गीतामृतं महत

"यह गीतोपनिषद, भगवद-गीता, सभी उपनिषदों का सार, एक गाय की तरह है, और भगवान कृष्ण, जो एक ग्वाले के रूप में प्रसिद्ध हैं, इस गाय को दूध देते हैं। अर्जुन बछड़े की तरह है, और विद्वान विद्वानों और शुद्ध भक्तों को भगवद-गीता के अमृत दूध को पीना है।" (गीता-माहात्म्य 6)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)