श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  1.5.54 
स्व-जीवनाधिक-प्रार्थ्य-
श्री-विष्णु-जन-सङ्गतेः
विच्छेदेन क्षणं चात्र
न सुखांशं लभामहे
 
 
अनुवाद
उन श्रीविष्णुभक्तों का संग हमें जीवन से भी अधिक प्रिय है। उस संग से वंचित होकर हमें कोई सुख नहीं मिल सकता।
 
The company of those devotees of Lord Vishnu is dearer to us than life itself. Without their company, we cannot find any happiness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)