श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  1.5.46 
वावदूक-शिरो-धार्य
नैवास्मासु कृपा हरेः
विचार्याभीक्ष्णम् अस्माभिर्
जातु काप्य् अवधार्यते
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले: हे तेजस्वी वक्ताओं के शिखर रत्न, भगवान हरि ने हम पर कोई दया नहीं की है। बहुत देर तक विचार करने पर भी हमें उनकी कोई दया याद नहीं आती।
 
Yudhishthira said, "O crown jewel of eloquent speakers, Lord Hari has shown us no mercy. Even after much thought, we cannot recall any of his kindnesses."
तात्पर्य
नारद को वाक्पटु वाग्मी कहकर युधिष्ठिर ने परोक्ष रूप से उनपर सच्चाई को तोड़-मरोड़कर कहने का इलज़ाम लगाया। युधिष्ठिर की राय में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि कृष्ण ने उनपर और उनके भाइयों पर विशेष कृपा की है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)