"स व किलायं पुरुषः पुरतानों य एक आसीद् अविशेष आत्मनी। अग्र गुनेभ्यो जगदात्मनीश्वरे निमीलितात्मनि निशि सुप्ताशक्तीषु।"
"यही वह पुरुषोत्तम भगवान हैं, जैसा कि हमें साफ-साफ याद है। वे ही सृष्टि की रचना के पहले से अकेले विद्यमान थे और उनमें ही सारा जगत समाया रहता है क्योंकि वही परमेश्वर हैं। और हमारे प्राणी उनमें उसी तरह सो रहे हैं जैसे कि रात में सोते समय हमारी शक्तियां सो जाती हैं।" (भागवत 1.10.21) इसके बाद वे महिलाएं वैष्णवों की तरह बोलने लगीं-
"अहो अलं श्लघ्यतमं यदोः कुलम। अहो अलं पुण्यतमं मधोर् वनं। यद् एष पुंसाम् ऋषभः प्रियः श्रीयाः। स्व जन्मना चक्रमाणेन चाञ्चति।"
"अहो! कितना महिमामय है यादव वंश और कितनी पवित्र है मथुरा की भूमि जहाँ सब प्राणियों के स्वामी, लक्ष्मीजी के प्रिय, अपना जन्म लेते हैं और बचपन में विचरण करते हैं।" (भागवत 1.10.26)
इस प्रकार पाण्डव लोग जिस समाज का नेतृत्व करते थे वहाँ तक जनता इतनी विद्वान थी तो पाण्डव स्वयं कितने सच्चरित्र रहे होंगे, यह सोचा जा सकता है।
