श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.5.41 
अहो बत महाश्चर्यं
कवीनां गेयतां गताः
भवदीय-पुर-स्त्रीणां
ज्ञान-भक्त्य्-उक्तयो हरौ
 
 
अनुवाद
सचमुच, तुम्हारे नगर की साधारण स्त्रियों के कहे हुए वचन मुझे विस्मित कर देते हैं। कृष्ण पर केन्द्रित, दिव्य ज्ञान और भक्ति से ओतप्रोत वे वचन, सिद्ध कवियों द्वारा गीतों में गाए गए हैं।
 
Truly, the words spoken by the ordinary women of your city astonish me. Those words, centered on Krishna, filled with divine wisdom and devotion, have been sung in songs by accomplished poets.
तात्पर्य
आम तौर पर कहा जाता है कि जब भी कोई राजा सच्चरित्र होता है तो उसकी जनता भी सच्चरित्र होती है। जैसे व्यासार्य और दूसरे महर्षियों ने अपने इतिहासों में वर्णन किया है कि युधिष्ठिर और उनके भाइयों के प्रशासन में हस्तिनापुर में सब विद्वान और संत थे। श्रीमद्भागवत के पहले अध्याय में हस्तिनापुर की छतों पर खड़ी हुई महिलाओं ने भगवान के रास्ते में से निकलने पर एक दूसरे से बातें की थी। उनकी बातें बहुत गंभीर विद्वानों जैसे लगती थी।

"स व किलायं पुरुषः पुरतानों य एक आसीद् अविशेष आत्मनी। अग्र गुनेभ्यो जगदात्मनीश्वरे निमीलितात्मनि निशि सुप्ताशक्तीषु।"

"यही वह पुरुषोत्तम भगवान हैं, जैसा कि हमें साफ-साफ याद है। वे ही सृष्टि की रचना के पहले से अकेले विद्यमान थे और उनमें ही सारा जगत समाया रहता है क्योंकि वही परमेश्वर हैं। और हमारे प्राणी उनमें उसी तरह सो रहे हैं जैसे कि रात में सोते समय हमारी शक्तियां सो जाती हैं।" (भागवत 1.10.21) इसके बाद वे महिलाएं वैष्णवों की तरह बोलने लगीं-

"अहो अलं श्लघ्यतमं यदोः कुलम। अहो अलं पुण्यतमं मधोर् वनं। यद् एष पुंसाम् ऋषभः प्रियः श्रीयाः। स्व जन्मना चक्रमाणेन चाञ्चति।"

"अहो! कितना महिमामय है यादव वंश और कितनी पवित्र है मथुरा की भूमि जहाँ सब प्राणियों के स्वामी, लक्ष्मीजी के प्रिय, अपना जन्म लेते हैं और बचपन में विचरण करते हैं।" (भागवत 1.10.26)

इस प्रकार पाण्डव लोग जिस समाज का नेतृत्व करते थे वहाँ तक जनता इतनी विद्वान थी तो पाण्डव स्वयं कितने सच्चरित्र रहे होंगे, यह सोचा जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)