श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.5.40 
आस्वादनं श्री-विदुरौदनस्य
श्री-भीष्म-निर्याण-महोत्सवश् च
तत्-तत्-कृत-त्वादृश-पक्ष-पात-
स्यापेक्षयैवेति विचारयध्वम्
 
 
अनुवाद
कृष्ण ने श्री विदुर के हाथ का दलिया भोग लगाया और श्री भीष्म के परिनिर्वाण का उत्सव मनाया। अतः कृपया अपनी स्थिति का मूल्यांकन इस आधार पर करें कि कितने विवादों में विदुर और भीष्म दोनों ने आपका पक्ष लिया।
 
Krishna offered the porridge prepared by Sri Vidura and celebrated the passing away of Sri Bhishma. Therefore, please evaluate your position based on how many disputes both Vidura and Bhishma supported you.
तात्पर्य
श्री कृष्ण विदुर और भीष्म दोनों के ही आंशिक थे। भले ही विदुर एक निम्न-जाति की शूद्राणी का पुत्र था, कृष्ण ने खुशी-खुशी विदुर के साधारण भोजन को साझा किया और इसे बहुत स्वादिष्ट कहकर इसकी प्रशंसा की। और कृष्ण ने भीष्म पर अपनी उपस्थिति से अनुग्रह किया जब भीष्म युद्ध के मैदान में अपना शरीर त्याग रहे थे। निर्याण का अर्थ है "आत्मा का शरीर से बाहर निकलना", लेकिन भीष्म जैसे एक परिपूर्ण आध्यात्मिकवादी के लिए इसका अर्थ "भगवान के अस्तित्व में विलीन होना" भी है। ईश्वर के भक्तों के लिए, उनके अस्तित्व में विलीन होने का अर्थ केवल एक आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करना और वैकुंठ के शाश्वत राज्य में प्रवेश करना हो सकता है। क्योंकि दादा भीष्म ने मृत्यु के क्षण में कृष्ण को अपनी आँखों के सामने देखा था, इसलिए भीष्म ने निश्चित रूप से केवल शुद्ध भक्तों के योग्य वैकुंठ मुक्ति प्राप्त की।

ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्ण ने विदुर और भीष्म का बहुत अधिक पक्ष लिया, यहाँ तक कि पांडवों से भी अधिक। लेकिन यहाँ नारद उस लोकप्रिय गलतफहमी को दूर करते हैं। वास्तव में विदुर और भीष्म कृष्ण को इतने प्रिय क्यों थे? कृष्ण उनसे न केवल उनकी अपनी भक्ति सेवा के कारण प्रसन्न थे, जो इतनी असाधारण नहीं थी, बल्कि मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि उन्होंने पांडवों की सेवा की, उन्हें दुर्योधन और अन्य शत्रुओं से बचाया। विदुर और भीष्म ने पार्थ के पुत्रों को असहाय होने पर आश्रय और स्नेह देकर प्रभु की नजर में उच्च सम्मान अर्जित किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)