स भवान् सुहृदाम् वै नः
श्रेयान् श्रेयस-चिकीर्षया
जिज्ञासार्थम् पाण्डवानाम्
गच्छस्व गजसाह्वयम्
"तुम निश्चित रूप से हमारे सर्वश्रेष्ठ मित्र हो, इसलिए कृपया हस्तिनापुर जाओ और पाण्डवों के शुभचिंतक के रूप में, यह पता लगाओ कि वे कैसे हैं।" (भागवतम् 10.48.32) इस मुलाकात के दौरान, पाण्डवों की माँ, पृथा, अक्रूर से मिलीं। क्योंकि अक्रूर एक शुद्ध वैष्णव थे, इसलिए उनके द्वारा बोले गए पहले शब्दों ने उनके हृदय में कृष्ण के प्रति प्रेम का रस उत्पन्न कर दिया।
