श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.5.26 
अपूर्वत्वेन तस्यैव
यो विस्मय-विधायकः
तथा लीला गुणाः प्रेमा
महिमा केलि-भूर् अपि
 
 
अनुवाद
कृष्ण के वे अभूतपूर्व आकर्षक स्वरूप मनुष्य को आश्चर्यचकित कर देते हैं। उनकी लीलाएँ, उनके गुण, उनका शुद्ध प्रेम, उनके यशस्वी गुण और वे स्थान जहाँ वे क्रीड़ा करते हैं, भी आश्चर्यचकित कर देते हैं।
 
Krishna's extraordinary attractive forms astonish man. His pastimes, his qualities, his pure love, his glorious qualities, and the places where he plays also astonish.
तात्पर्य
कृष्ण का हर रूप आकर्षक है, न कि केवल उनका शारीरिक सौंदर्य। उनका हर कार्य चंचल और विविधताओं से भरा हुआ है। उनकी करुणा जैसे गुण संपूर्ण और असीमित हैं। और वह अपने भक्तों को बिना शर्त प्यार करते हैं, जैसा कि वह उन्हें प्यार करते हैं। वह श्रेष्ठ चरित्र के सभी गुण प्रदर्शित करते हैं, जैसे दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्तियों के लिए चिंता, और अपने भक्तों की इच्छाओं के लिए समर्पण। श्री वृंदावन वन और उनके अन्य सुख स्थल भी उन सभी के दिलों को आकर्षित करते हैं जो प्रवेश करते हैं। पाण्डव, जिन्हें नारद ने "कृष्ण के भाइयों" के रूप में संबोधित किया है, ने निश्चित रूप से इन सत्यों को महसूस किया है और इसलिए मानव जाति में सबसे भाग्यशाली हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)