हालाँकि, पाण्डवों ने कोई आध्यात्मिक अनुशासन लिए बिना ही कृष्ण का पक्ष प्राप्त कर लिया है। कृष्ण के लिए उनका प्रेम इतना दृढ़ और स्वतःस्फूर्त है कि वे उसके अधीन हो जाते हैं, अपने भक्तों के आदेशों का पालन एक मामूली सेवक की तरह करते हैं। श्रीमद्-भागवतम के सातवें काण्ड में वर्णित है कि हस्तिनापुर की एक यात्रा के दौरान नारद ने प्रह्लाद का इतिहास बताते हुए युधिष्ठिर से इस पर विस्तार से चर्चा की। इस वर्णन के अंत में, नारद ने युधिष्ठिर और उनके भाइयों को आश्वासन दिया कि वे प्रह्लाद से कम महान नहीं थे:
यूयं नृ-लोके बट भूर्या-भागा
लोकं पुनान मुन्नयोभियंति
येषां गृहान आभसतीति साक्षात्
गुढं परं ब्रह्म मनुष्य-लिग्मम
"प्रिय महाराज युधिष्ठिर, आप सभी [पाण्डवों] अत्यंत भाग्यशाली हैं, क्योंकि भगवान कृष्ण, सर्वोच्च व्यक्तित्व, आपके महल में एक इंसान की तरह रहते हैं। महान संतजन इसे अच्छी तरह जानते हैं, और इसलिए वे लगातार इस घर में आते रहते हैं।
सा व अयं ब्रह्म महाद-विमृग्य-
कैवल्य-निर्वाण-सुकानुभूतिः
प्रियः सुहृद वाः खलु मातुलेय
आत्मारहणीयो विधि-कृद गुरुश च
"निराकार ब्रह्म स्वयं कृष्ण हैं क्योंकि कृष्ण निराकार ब्रह्म के स्रोत हैं। वह उस असीम आनंद का मूल हैं जिसे महान संतजन चाहते हैं, फिर भी वह, परम पुरुष, आपके सबसे प्रिय मित्र और निरंतर शुभचिंतक हैं और आपके मामा के पुत्र के रूप में आपसे घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। निश्चित रूप से, वह हमेशा आपके शरीर और आत्मा की तरह हैं। वह पूजनीय हैं, फिर भी वह आपके सेवक और कभी-कभी आपके आध्यात्मिक गुरु के रूप में कार्य करते हैं।
न यस्य साक्षाद भव-पद्मजाविभिः
रूपं धिया वास्तुतय उपवर्णितम
मौनेन भक्त्यशामेन पूजितः
प्रसीदताम एष स सात्वतां पतिः
"भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा जैसे श्रेष्ठ व्यक्ति भगवान कृष्ण, सर्वोच्च व्यक्तित्व, की सच्चाई का ठीक से वर्णन नहीं कर सके। उन्हें हमेशा महान संतों द्वारा सभी भक्तों के रक्षक के रूप में पूजा जाता है जो मौन, ध्यान, भक्ति सेवा और त्याग के व्रत का पालन करते हैं। वह परम भगवान हम पर प्रसन्न हों।" (भागवत 7.10.48-50)
प्रभु नृसिंहदेव द्वारा प्रह्लाद को मुक्ति दिलाने का लेखा-जोखा पूरा करते समय, नारद ने देखा कि पाण्डव कुछ निराश लग रहे थे, जैसे उन्हें प्रभु से प्रह्लाद जैसी ही दया प्राप्त करने की कोई आशा नहीं थी। इस चिंता को शांत करने के लिए नारद ने ये तीन श्लोक बोले। पाण्डवों का जीवन वास्तव में उतना निराशाजनक नहीं हो सकता था जितना वे समझते थे; आखिरकार, ब्रह्मांड के सभी कोनों से पूजनीय ऋषि कृष्ण से मिलने उनके घर आते थे। पाण्डवों के साथ कृष्ण का सदैव निवास पाण्डवों के महान भाग्य और कृष्ण के उन पर अत्यधिक अनुग्रह को दर्शाता है। नारद के पिता, ब्रह्मा, और चार कुमारों जैसे अन्य महान रहस्यवादी केवल भविष्य की सफलता की एक धुंधली आशा के साथ कृष्ण को पाने का प्रयास कर सकते हैं।
वेदों में इंगित किए गए एकता का बिना शर्त आनंद वास्तव में कृष्ण के व्यक्तित्व में समाहित है, और वह पाण्डवों के साथ सबसे अंतरंग तरीकों से जुड़ते हैं। वह उनके सबसे प्रिय मित्र हैं, जो हमेशा उन पर स्नेह दिखाते हैं। वह उनके निरंतर शुभचिंतक हैं, जो बिना किसी लाभ की गणना के उनके लाभ के लिए कार्य करते हैं। और वह उनके पूजनीय भगवान और उनके आदेशों के निष्पादक हैं। वह पूर्णता का कोई दूर का लक्ष्य नहीं है, बल्कि सीधे पाण्डव सभा में उपस्थित हैं। निकट सर्वनाम अयम ("यह निकट व्यक्ति") का उपयोग करके, नारद का तात्पर्य है कि कृष्ण अपनी प्रसन्नता पर पाण्डवों के साथ पारस्परिकता करने के लिए तैयार हैं। इस प्रकार नारद संकेत करता है कि उनके शाही दरबार में कृष्ण की उपस्थिति से पाण्डवों के परम सौभाग्य की लहर उमड़ती है और पूरे विश्व में फैल जाती है।
एक संशयवादी पूछ सकता है, "यदि वास्तव में कृष्ण पूर्ण सत्य हैं, तो वह सोलह हजार पत्नियों से क्यों जुड़ते हैं, और वह सामान्य धार्मिक सिद्धांतों का पालन क्यों करते हैं?" इन सातवें काण्ड श्लोकों में से तीसरे में, नारद उत्तर देते हैं: कृष्ण के बारे में सब कुछ समझने की अपेक्षा न करें। भगवान शिव, ब्रह्मा और अन्य महान रहस्यवादी भी उनका पूरा वर्णन नहीं कर सकते। वे उनके किसी एक अंग की सुंदरता का भी पूरा वर्णन नहीं कर सकते। वे इन अलौकिक तथ्यों को शब्दों में नहीं डाल सकते, और न ही उन्हें अपने दिमाग में कल्पना कर सकते हैं। "और अगर ऐसे महान अधिकारी कृष्ण को समझाने की कोशिश में निराश हैं," नारद का तात्पर्य है, "तो मेरे जैसा कोई क्या कर सकता है?" हालाँकि, पाण्डवों का श्री कृष्ण के साथ एक विशेष संबंध है, जिसके द्वारा वे उन्हें किसी भी देवता से कहीं अधिक अंतरंग रूप से जानते हैं। कृष्ण स्पष्ट रूप से पाण्डवों से संतुष्ट हैं, जबकि देवताओं को, विभिन्न आध्यात्मिक पद्धतियों द्वारा, अभी भी उनकी संतुष्टि प्राप्त करने का प्रयास करना होगा।
पूर्ण सत्य प्रह्लाद के घर में नहीं रहते हैं, और इसलिए संत प्रह्लाद के घर भगवान को देखने के लिए नियमित रूप से नहीं जाते हैं। भगवान का व्यक्तित्व प्रह्लाद के मामा की भूमिका नहीं निभाता है, और न ही प्रह्लाद को इतने सारे तरीकों से अपनी संतुष्टि दिखाता है। इसलिए, नारद का तर्क है, पाण्डवों को स्वीकार करना चाहिए कि वे सभी अन्य लोगों से अधिक भाग्यशाली हैं- संत, देवता और अन्य भक्त।
