श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  1.5.132 
तत् तत्र गत्वा भवताशु मादृशां
सन्देशम् एतं स निवेदनीयः
अद्यात्यगाद् आगमनस्य वेला
स्व-नाथम् आदाय सभां स-नाथय
 
 
अनुवाद
अतः कृपया शीघ्र ही उद्धव के पास जाकर हमारी ओर से यह संदेश दीजिए: आज सभाभवन में आने का नियत समय बीत चुका है। कृपया कृष्ण को लेकर आइए और हमारे स्वामी की उपस्थिति से सभा को सुशोभित कीजिए।
 
Therefore, please go to Uddhava immediately and convey this message from us: The appointed time for arrival at the assembly hall has passed today. Please bring Krishna and grace the assembly with the presence of our master.
तात्पर्य
नाराड़जी ने कुरुक्षेत्र में महाराज परीक्षित से कहा था कि हे परीक्षित! साँभा सा नायय यानि सभा में पधारो, शाब्दिक रूप से इसका भावार्थ है, "सभा मे स्वामी तुल्य पधारो"। यहाँ इसका भाव यह है कि कौरव वंशज कृष्ण के दर्शन के बिना अपने आपको असहाय समझते हैं। उन्हें कृष्ण का साक्षात्कार रोजाना होगा और वे इसकी अपेक्षा रखते हैं । इस श्लोक में एक और भाव यह भी है कि याज्ञ सेनिकों को नारदजी से इसलिए अधिक भाग्यशाली कहा गया है कि नारदजी जब चाहें कृष्ण के अति गोपनीय भवन में जा सकते हैं और कृष्ण के दर्शन कर सकते हैं ।
 
इस प्रकार श्रील सनातन गोस्वामी के बृहद-भागवतामृत के भाग एक का पाँचवाँ अध्याय, “प्रिय (प्रिय भक्त)”, समाप्त होता है।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)