श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  1.5.123 
किं तस्य सौभाग्य-कुलं हि वाच्यं
वातुलतां प्राप किलायम् एवम्
आ-शैशवाद् यः प्रभु-पाद-पद्म-
सेवा-रसाविष्टतयोच्यते ’ज्ञैः
 
 
अनुवाद
उसके निरंतर सौभाग्य का क्या कहा जाए? बचपन से ही वह अपने स्वामी के चरण-कमलों की सेवा में इतना रमा हुआ है कि मूर्ख लोग उसे पागल कहते हैं।
 
What can be said about his constant good fortune? From childhood, he has been so absorbed in serving his master's feet that foolish people call him mad.
तात्पर्य
वातुल का अर्थ है "पागल", अथवा, चिकित्सीय दृष्टि से अधिक सटीक रूप से, "वात (वायु) के असंतुलन से मानसिक पीड़ा से ग्रस्त होना"। जब बिना आध्यात्मिक विवेक वाले भोले व्यक्ति समाधि लगाये हुए उद्धव को देखते थे, जो अपने आस-पास की दुनिया को नज़रअंदाज़ करते थे, या उन्हें प्रेत से ग्रस्त व्यक्ति की तरह बड़बड़ाते हुए देखते थे, तो वे उन्हें पागल समझ लेते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)