श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  1.5.120 
यस् तिष्ठन् भोजन-क्रीडा-
कौतुकावसरे हरेः
महा-प्रसादम् उच्छिष्टं
लभते नित्यम् एकलः
 
 
अनुवाद
जब भगवान कृष्ण क्रीड़ापूर्वक भोजन का आनंद लेते हैं, तब उद्धव उनके साथ अकेले रहते हैं। अतः वे ही एकमात्र व्यक्ति हैं जो सदैव भगवान का महाप्रसाद प्राप्त कर सकते हैं।
 
When Lord Krishna playfully enjoys food, Uddhava remains alone with Him. Therefore, he is the only one who can always receive the Lord's great offerings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)