श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  1.5.117 
अस्मान् विहाय कुत्रापि
यात्रां स कुरुते प्रभुः
न हि तद्-दुःखम् अस्माकं
दृष्टे त्व् अस्मिन्न् अपव्रजेत्
 
 
अनुवाद
कभी-कभी प्रभु हमें छोड़कर यात्रा पर निकल जाते हैं। इससे हमें इतना दुःख होता है कि जब हम उन्हें दोबारा देखते हैं, तब भी यह पीड़ा दूर नहीं होती।
 
Sometimes the Lord leaves us and goes on a journey. This causes us so much grief that even when we see Him again, the pain doesn't go away.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)