श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  1.5.106 
शय्यासनाटनालाप-
क्रीडा-स्नानाशनादिषु
वर्तमाना अपि स्वान् ये
कृष्ण-प्रेम्णा स्मरन्ति न
 
 
अनुवाद
खाते, सोते, बैठते, चलते, बोलते, स्नान करते, मनोरंजन करते यदु लोग कृष्ण के प्रति इतने शुद्ध प्रेम में लीन रहते हैं कि वे अपने परिवार और सम्पत्ति को भी भूल जाते हैं।
 
While eating, sleeping, sitting, walking, talking, bathing, and entertaining themselves, the Yadus are so absorbed in pure love for Krishna that they even forget their families and possessions.
तात्पर्य
कृष्ण के लिए प्रेम एक गहरा सागर है, जिसमें उनके शुद्ध भक्त अपने दिल की संतुष्टि तक गोता लगाते हैं। इस प्रकार पूर्ण रूप से कृष्ण चेतना में डूबे हुए, यादव अपनी भौतिक संपत्ति के प्रति बेखबर थे, जिसमें उनके परिवार और उनके अपने शरीर भी शामिल थे। इस दुनिया में सभी दौलत उनका ध्यान भटका नहीं सकती थी।

नारद का यह कथन भागवत (10.90.46) के दसवें कांड के अंत में शुकदेव के शब्दों के समानांतर है:

शय्यासनाटनालाप-

क्रीड़ा-स्नानाशनआदिषु

न विदुः सन्तं आत्मानं

वृष्णयः कृष्ण-चेतसः

"वृष्णियां कृष्ण चेतना में इतने लीन थे कि सोते, बैठते, चलते, बातचीत करते, खेलते, नहाते, खाते आदि क्रियाओं में वे अपने शरीर को भूल जाते थे।" इस प्रकार कृष्ण ने एक बार अपनी पत्नी सत्यभामा से कहा:

एते हि यादवाः सर्वे

मद्-गणा एव भामिनि

सर्वदा मत्-प्रिया देवि

मत्-तुल्य-गुण-शालिनः

"प्रिय इच्छाशक्ति वाली देवी, इन यादवों में से प्रत्येक मेरा शाश्वत सहयोगी है। वे हमेशा मुझे प्रिय हैं, और उनके गुण मेरे अपने गुणों के बराबर हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)