नारद का यह कथन भागवत (10.90.46) के दसवें कांड के अंत में शुकदेव के शब्दों के समानांतर है:
शय्यासनाटनालाप-
क्रीड़ा-स्नानाशनआदिषु
न विदुः सन्तं आत्मानं
वृष्णयः कृष्ण-चेतसः
"वृष्णियां कृष्ण चेतना में इतने लीन थे कि सोते, बैठते, चलते, बातचीत करते, खेलते, नहाते, खाते आदि क्रियाओं में वे अपने शरीर को भूल जाते थे।" इस प्रकार कृष्ण ने एक बार अपनी पत्नी सत्यभामा से कहा:
एते हि यादवाः सर्वे
मद्-गणा एव भामिनि
सर्वदा मत्-प्रिया देवि
मत्-तुल्य-गुण-शालिनः
"प्रिय इच्छाशक्ति वाली देवी, इन यादवों में से प्रत्येक मेरा शाश्वत सहयोगी है। वे हमेशा मुझे प्रिय हैं, और उनके गुण मेरे अपने गुणों के बराबर हैं।"
