श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  1.5.101 
अहो अलं श्लाघ्य-तमं यदोः कुलं
चकास्ति वैकुण्ठ-निवासितो ’पि यत्
मनुष्य-लोको यद्-अनुग्रहाद् अयं
विलङ्घ्य वैकुण्ठम् अतीव राजते
 
 
अनुवाद
निःसंदेह, यह यदुवंश परम वंदनीय है! आप वैकुंठवासियों से भी अधिक तेजस्वी हैं! आपकी कृपा से यह मानवलोक वैकुंठ से भी आगे बढ़कर परम वैभव को प्राप्त कर चुका है।
 
Undoubtedly, this Yadu dynasty is worthy of supreme respect! You are more radiant than even the inhabitants of Vaikuntha! By your grace, this human world has attained supreme glory, surpassing even Vaikuntha.
तात्पर्य
वैकुण्ठ में भगवान के कई आकर्षक सहयोगी हैं, जिनका व्यक्तित्व और धन-समृद्धि प्रशंसनीय और आकर्षक है। नारद को यह देखकर आश्चर्य होता है कि द्वारका के पृथ्वीवासी गरुड़ और अन्य वैकुंठवासियों से भी अधिक ऊँचे हैं। यादवों ने मर्त्यलोक, जहाँ अल्पजीवी इंसान रहते हैं, में कृष्ण की शुद्ध भक्ति का दयापूर्वक प्रचार किया है। इस तरह उन्होंने इस नश्वर क्षेत्र को वैकुण्ठ से अधिक शानदार बना दिया है। वैकुण्ठ के भक्त निश्चित रूप से परम प्रभु के प्रिय हैं, पर उतने नहीं जितना द्वारका के भक्त।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)