श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  1.4.98 
वानराणाम् अबुद्धीनां
मादृशां तत्र का कथा
वेत्सि त्वम् अपि तद्-वृत्तं
तद् विशङ्के ’पराधतः
 
 
अनुवाद
तो फिर मुझ जैसे मूर्ख वन वानरों के बारे में क्या कहा जाए? कृष्ण की लीलाएँ कितनी विचित्र रूप से प्रकट होती हैं (जैसा कि आप भी जानते हैं), इस कारण मैं अपराध करने से डरता हूँ।
 
So what about foolish forest monkeys like me? Because of how strangely Krishna's pastimes unfold (as you also know), I am afraid to offend.
तात्पर्य
हनुमान विचार करते हैं, "यदि ब्रह्मा कृष्ण की उपस्थिति में असमंजस में पड़ सकते हैं," तो मैं उन्हें देखते ही अपनी बुद्धि खो दूंगा। कोई हनुमान को यह समझाने की कोशिश कर सकता है, "लेकिन जो लोग इस तरह भ्रमित होते हैं वे ज्ञानी हैं, शुष्क ज्ञान से जुड़े हुए ऋषि। ब्रह्मा अपने ज्ञान और उच्च पद के प्रति आसक्ति के कारण भ्रमित हो गए। लेकिन शुद्ध भक्त उसी भ्रम के शिकार नहीं होंगे।" हनुमान का उत्तर है कि नारद स्वयं भ्रमित हो गए जब वे द्वारका आए और सोलह हजार महलों में से प्रत्येक में एक अलग कृष्ण को देखा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)