श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  1.4.89 
तस्माद् भागवत-श्रेष्ठ
प्रभु-प्रियतमोचितम्
तत्र नो गमनं तेषां
दर्शनाश्रयणे तथा
 
 
अनुवाद
अतः हे वैष्णवश्रेष्ठ, हे भगवान के परम प्रिय भक्त! आओ हम सब मिलकर पाण्डवों के दर्शन करें और उनकी शरण लें।
 
Therefore, O best of Vaishnavs, O most beloved devotees of the Lord, let us all together visit the Pandavas and take refuge in them.
तात्पर्य
हनुमान के शब्द संकेत देते हैं कि वे नारद को भी उतना ही भाग्यशाली मानते हैं जितने कि भगवान कृष्ण का अनुग्रह प्राप्त करने वाले पाण्डवों को। चूँकि हनुमान और नारद दोनों ही दास्य भाव के सेवक हैं, इसलिये पाण्डवों से उनके निवास पर मिलने जाना और यहाँ तक कि भक्ति सेवा के विषय में जानने को उनके साथ रहना भी उनके लिये सर्वथा उपयुक्त है। पाण्डवों से मिलने के योग्य होने के अतिरिक्त, हनुमान और नारद, रात्रि में उनके लिये पहरेदारी जैसी सेवाएँ देकर उनसे विशेष कृपा प्राप्त करने में भी सक्षम होने चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)