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श्लोक 1.4.88  |
प्रभोः प्रिय-तमानां तु
प्रसादं परमं विना
न सिध्यति प्रिया सेवा
दासानां न फलत्य् अपि |
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| अनुवाद |
| भगवान के परम प्रिय मित्रों की निःशर्त दया के बिना, भक्त की प्रेममयी सेवा कभी सफल नहीं हो सकती या फल नहीं दे सकती। |
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| Without the unconditional mercy of the Lord's most beloved friends, the devotee's loving service can never be successful or bear fruit. |
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