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श्लोक 1.4.85  |
अहो महा-प्रभो भक्त-
वात्सल्य-भर-निर्जित
करोष्य् एवम् अपि स्वीय-
चित्ताकर्षक-चेष्टित |
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| अनुवाद |
| हे स्वामियों के स्वामी, आप अपने भक्तों के प्रति अपने महान स्नेह से वशीभूत हैं! इसी प्रकार आप उनके हृदयों को आकर्षित करते हैं। |
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| O Lord of lords, You are captivated by Your great affection for Your devotees! Thus You attract their hearts. |
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