श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.4.85 
अहो महा-प्रभो भक्त-
वात्सल्य-भर-निर्जित
करोष्य् एवम् अपि स्वीय-
चित्ताकर्षक-चेष्टित
 
 
अनुवाद
हे स्वामियों के स्वामी, आप अपने भक्तों के प्रति अपने महान स्नेह से वशीभूत हैं! इसी प्रकार आप उनके हृदयों को आकर्षित करते हैं।
 
O Lord of lords, You are captivated by Your great affection for Your devotees! Thus You attract their hearts.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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