श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  1.4.84 
इत्य् उक्त्वा हनूमान् मातः
पाण्डवेय-यशस्विनि
उत्प्लुत्योत्प्लुत्य मुनिना
मुहुर् नृत्यति वक्ति च
 
 
अनुवाद
[परीक्षित महाराज ने कहा:] हे माता, हे पाण्डवपुत्र की सुप्रसिद्ध पत्नी, ऐसा कहने के बाद हनुमान बार-बार ऊपर उछले, और नारद मुनि के साथ नाचने लगे। फिर उन्होंने बोलना जारी रखा।
 
[Parikshit Maharaja said:] O mother, O illustrious wife of the son of Pandava, after saying this Hanuman leaped up again and again, and began to dance with the sage Narada. Then he continued speaking.
तात्पर्य
जब शुद्ध भक्तों की महिमा की जाती है तो उनके साथ जुड़े सभी लोग, जिसमें उनके परिवार और शिष्य शामिल हैं, उनकी भी महिमा होती है। उत्तर, जिनसे परीक्षित बात कर रहे हैं, वह उनकी माँ और अभिमन्यु की पत्नी दोनों हैं, जिन्हें यहाँ पाण्डवेय के रूप में संदर्भित किया गया है क्योंकि वह अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र थे। इस प्रकार श्रीमती उत्तर विवाह और परीक्षित की माँ होने के कारण पाण्डवों की महिमा में साझा होती थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)