श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.4.81 
श्री-हनूमान् उवाच
तेषाम् आपद्-गणा एव
सत्तमाः स्युः सु-सेविताः
ये विधाय प्रभुं व्यग्रं
सद्यः सङ्गमयन्ति तैः
 
 
अनुवाद
श्री हनुमान ने कहा: पाण्डवों पर आई सभी विपत्तियाँ अत्यंत शुभ तथा वांछनीय थीं, क्योंकि उन विपत्तियों ने भगवान को शीघ्र ही पाण्डवों के पास जाने के लिए उत्सुक कर दिया था।
 
Sri Hanuman said: All the calamities that befell the Pandavas were extremely auspicious and desirable, because those calamities made the Lord eager to go to the Pandavas soon.
तात्पर्य
जब कभी कृष्ण को खबर मिलती कि पाण्डव खतरे में हैं, तब वह जो कुछ भी करते, वही छोड़ देते और उनकी सहायता के लिए तुरंत चले जाते। और चूँकि पाण्डवों का दुर्भाग्य शुभ था, तो उनका सौभाग्य कितना महाशुभ होगा! कृष्ण ने भाइयों की जरासंध वध में सहायता की और उसके बाद युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सबके पैर धोए। अतः कौन पाण्डवों और कृष्ण के प्रेमवार्तालाप की महिमा का समुचित वर्णन कर सकता है? इससे पूर्व हनुमान ने कहा था कि पाण्डवों की विपत्तियाँ वास्तविक नहीं थीं, ये तो मात्र एक दिखावा था जिसका प्रबन्ध कृष्ण ने पाण्डवों की अडिगता और अन्य सात्विक गुणों के विज्ञापन करने हेतु किया था। पर अब हनुमान कुछ और ही कहते हैं। यद्यपि विपत्तियों को वास्तविक मान लिया जाए, जैसी कि ये आम निगाहों में दिखाई पड़ती हैं, फिर भी वे विपत्तियाँ पाण्डवों के लिए सबसे बड़े सौभाग्य को लेकर आईं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)