श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  1.4.78 
यस्य सन्तत-वासेन
सा येषां राजधानिका
तपो-वनं महर्षीणाम्
अभूद् वा सत्-तपः-फलम्
 
 
अनुवाद
चूँकि भगवान पाण्डवों के साथ निरन्तर निवास करते हैं, अतः उनकी राजधानी पवित्र वन के समान हो गई है, जहाँ महान ऋषिगण तपस्या करते हैं और उस नगरी में निवास करने से कठोर तपस्या के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
 
Because the Lord constantly resides with the Pandavas, their capital has become like a sacred forest where great sages perform penance, and living in that city yields the same meritorious results as severe penance.
तात्पर्य
अनेक संन्यासी ऋषि, श्री कृष्ण को देखने के लिए पाण्डवों की राजधानी हस्तिनापुर आए क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते थे कि उन्हें देखना सभी तपस्याओं की सिद्धि है। जैसा कि नारद ने युधिष्ठिर से कहा:

यूयं नृ-लोके बट भूर्-भाग

लोकान् पुनान मुणयोभियन्ति

येषाम् गृहानवासतीति साक्षाद

गूढम् परम् ब्रह्म मनुष्य-लिंगम्

"तुम सभी पाण्डव बहुत भाग्यशाली हो, क्यूँकि भगवान कृष्ण, आपके महल में एक मनुष्य की तरह रहते हैं। महात्मा इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं, और इसलिए वे लगातार इस घर में आते हैं।" (भागवतम 7.10.48)

कृष्ण के भक्तों के लिए, तप का तात्पर्य शरीर की तकलीफदेह तपस्या से नहीं है बल्कि मन की एकाग्रता से है। और उनके शुद्ध भक्तों के लिए, मन को कृष्ण पर केन्द्रित करना कोई तपस्या नहीं है, बल्कि यह परम आनंद है। हस्तिनापुर में वैष्णवों के लिए तप (सत-तपः-फलम) का मूल्यवान फल उन्हें लगातार देखने में सक्षम होना था, कभी-कभी शारीरिक रूप से लेकिन हमेशा उनके दिलों में।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)