यूयं नृ-लोके बट भूर्-भाग
लोकान् पुनान मुणयोभियन्ति
येषाम् गृहानवासतीति साक्षाद
गूढम् परम् ब्रह्म मनुष्य-लिंगम्
"तुम सभी पाण्डव बहुत भाग्यशाली हो, क्यूँकि भगवान कृष्ण, आपके महल में एक मनुष्य की तरह रहते हैं। महात्मा इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं, और इसलिए वे लगातार इस घर में आते हैं।" (भागवतम 7.10.48)
कृष्ण के भक्तों के लिए, तप का तात्पर्य शरीर की तकलीफदेह तपस्या से नहीं है बल्कि मन की एकाग्रता से है। और उनके शुद्ध भक्तों के लिए, मन को कृष्ण पर केन्द्रित करना कोई तपस्या नहीं है, बल्कि यह परम आनंद है। हस्तिनापुर में वैष्णवों के लिए तप (सत-तपः-फलम) का मूल्यवान फल उन्हें लगातार देखने में सक्षम होना था, कभी-कभी शारीरिक रूप से लेकिन हमेशा उनके दिलों में।
