किं वा स-स्नेह-कातर्यात्
तेषां नाचरति प्रभुः
सेवा सख्यं प्रियत्वं तद्
अन्योन्यं भाति मिश्रितम्
अनुवाद
उनके प्रति अपनी स्नेहपूर्ण चिंता के कारण, प्रभु क्या नहीं करते? वे उनके सेवक, साथी और परमप्रिय मित्र की संयुक्त भूमिकाएँ निभाते हुए देखे गए, और उन्होंने भी उनके लिए वही भूमिकाएँ निभाईं।
Out of His loving concern for them, what did the Lord not do? He was seen to play the combined roles of their servant, companion, and dearest friend, and they too played the same roles for Him.
तात्पर्य
पाण्डवों के लिए, कृष्ण ने भीष्म द्वारा उन पर हमला और उन्हें घायल किये जाने को सहा। पाण्डवों के लिए, कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में युद्ध ना करने की अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी। वास्तव में, कृष्ण पाण्डवों के लिए कुछ भी कर सकते थे। किन्तु एक सन्देही व्यक्ति प्रश्न कर सकता है, "हालांकि भगवान अपनी सभी प्राणियों के प्रति दयालु हैं और निश्चित रूप से अपने भक्तों के मित्र हो सकते हैं, फिर भी उन्हें स्वयं को साधारण मनुष्यों पर भरोसा करके और उनके सेवक की भांति कार्य करके खुद को नीचा क्यों दिखाना चाहिए?" यहां हनुमान इस प्रकार के संदेहों को दूर करते हैं: पाण्डवों के लिए कृष्ण की विविध सेवाएं केवल ऊपरी दिखावा नहीं थी बल्कि उनकी सच्ची भावनाओं की अभिव्यक्ति थीं। वह एक क्षण में मित्र की भूमिका निभाने और सेवा करने से अनिच्छुक नहीं थे; दूसरे क्षण में सेवा करने के लिए इच्छुक दिखना और मित्रता ना दिखाना नहीं था; तीसरे क्षण में मित्रता का दिखावा करना और वास्तविक चिंता ना होना, और चौथे क्षण में प्यारा सा रोष दिखाना और वस्तुतः मित्र ना होना, ये सब नहीं था। इस प्रकार के असंगत प्रतिदान सांसारिक जीवन में देखे जाते हैं, जहां कोई भी सच्चा प्रेम नहीं है। हालाँकि, पाण्डवों के साथ कृष्ण के व्यवहार में हमेशा कपटता से मुक्त थे। और भावनाएं पारस्परिक थीं; पाण्डव कृष्ण की खुशी के लिए कुछ भी बलिदान करने को तैयार थे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥