श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  1.4.76 
सारथ्यं पार्षदत्वं च
सेवनं मन्त्रि-दूतते
वीरासनानुगमने
चक्रे स्तुति-नतीर् अपि
 
 
अनुवाद
वह उनके सेवक, सलाहकार, संदेशवाहक, सारथी और दरबारी के रूप में कार्य करता था। वह रात में उन पर नज़र रखता था, जुलूसों में उनके साथ चलता था, और यहाँ तक कि उनकी स्तुति और वंदना भी करता था।
 
He served as their servant, advisor, messenger, charioteer, and courtier. He watched over them at night, accompanied them in processions, and even sang their praises and venerations.
तात्पर्य
सिर्फ़ प्रभु कृष्ण ने ही गुप्त परमात्मा के रूप में पांडवों की देखभाल नहीं की बल्कि वो उनके साथ कई सारे सार्वजनिक प्रेम के تبادلو में भी दिखे। कई बार उन्होंने अर्जुन के रथ को चलाया। युधिष्ठिर के दरबार में, वो सलाहकारों की सभा के मुखिया के रूप में बैठे रहे। एक घनिष्ठ सेवक की तरह उन्होंने पांडवों की इच्छाओं की पूर्ति की और राजसूय यज्ञ में उन्होंने बहुत ही विनम्रता से सब मेहमानों के पांव पखारे। व्यक्तिगत रूप से, उन्होंने युधिष्ठिर को सलाह दी और उनके लिए संदेश भी लिए। मौकों पर, वो पूरी रात तलवार हाथ में लिए पहरेदारी करते दिखाई देते। और जैसे एक सामान्य गुलाम की तरह, वो जुलूस में युधिष्ठिर के पीछे चलते थे और उनकी तारीफ करते थे। सभी वैष्णवों को पांडवों के इस गौरव को सुनने में खुशी होती है। लेकिन जिनका पांडवों से एक खास रिश्ता है, जैसे कि उनके पोते परीक्षित को इन सबको सुनकर खास एक्स्टसी महसूस होती है। जैसे कि श्री सूत गोस्वामी ने श्रीमद्भागवतम के पहले कांड (1.16.16) में बयान किया है:

sārathya-pāraṣada-sevana-sakhya-dautya-

vīrāsanānugamana-stavana-praṇāmān

snigdheṣu pāṇḍuṣu jagat-praṇatiṁ ca viṣṇor

bhaktiṁ karoti nṛpatiś caraṇāravinde

"महाराजा परीक्षित ने सुना कि प्रभु कृष्ण (विष्णु), जिनका हर जगह पालन होता है, उन्होंने बिना वजह दया करके पांडु के नरम बेटों की बहुत तरह से सेवा की थी। प्रभु ने पांडवों की मर्ज़ी के अनुसार रथ चालक से लेकर अध्यक्ष, दूत, दोस्त और रात के पहरेदार तक के पदों को स्वीकार किया जैसे कि वो उनका सेवक हो और उनके आगे छोटे की तरह नतमस्तक हुए। जब महाराजा परीक्षित ने ये सुना, तो अपने प्रभु के चरण कमलों के लिए ये श्रद्धा से भर उठे।"

हनुमान जी ने जो कविता बोली है, उसमें कृष्ण और पांडवों के बीच दोस्ती का ज़िक्र नहीं किया है क्योंकि उनके बीच के ये सारे लेनदेन उस नीचे छिपे रिश्ते की वजह से होते थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)