हनुमान ने अपनी समस्त इंद्रियों और योग्यताओं को भगवान रामचंद्र की सेवा में लगा दिया। उस सेवा के सिवाय कुछ भी उसे प्रिय नहीं था। उसे अपने शरीर या शरीर से संबंधित किसी भी चीज़ से मोह नहीं था। परंतु अपने भगवान राम की पवित्र महिमा को वह स्वयं जीवन से भी अधिक संजोकर रखता था। यदि वह अपने भगवान से अलग रहते हुए उनकी महिमा को सुनने और जपने से वंचित रह जाता, तो वह तुरंत मर जाता। निश्चित रूप से, यह सर्वविदित है कि जहां कहीं भी राम कथा का पाठ होता है, हनुमान उसे सुनने आते हैं। वह आज और प्राचीन काल दोनों में ही भगवान रामचंद्र के भक्तों के आनंद को बढ़ाने का हर संभव प्रयास करते हैं। भगवान के निजी सेवकों में, हनुमान सबसे अधिक गौरवशाली हैं, गरुड़ से भी श्रेष्ठ हैं। उत्कृष्ट वैष्णव यमुनाचार्य आलबंदरु कहते हैं:
दासः सखा वाहनम आसनं ध्वजो
यस्ते विभानां व्यजनं त्रयी-मयः
उपस्थितं ते पुरतो गरुत्मता
त्वद-अंघ्रि-सम्मर्दकिणांग-शोभिना
"हे हनुमान, आप प्रभु के सेवक, मित्र, वाहक, आसन, पताका, छत्र और पंखा हैं। आप तीनों वेदों के साकार रूप हैं। गरुड़ की उपस्थिति में भी, आप भगवान के चरणों की मालिश करने के सम्मान से सुशोभित हैं।" (स्तोत्ररत्न 41)
