श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.4.58 
चुक्रोश नारदो मोदाज्
जय श्री-रघुनाथ हे
जय श्री-जानकी-कान्त
जय श्री-लक्ष्मणाग्रज
 
 
अनुवाद
नारदजी हर्ष से चिल्ला उठे, "श्री रघुनाथ आपकी जय हो! श्री जानकी के प्रियतम की जय हो! श्री लक्ष्मण के बड़े भाई की जय हो!"
 
Narada shouted with joy, "Victory to you, Lord Raghunath! Victory to the beloved of Sri Janaki! Victory to the elder brother of Sri Lakshmana!"
तात्पर्य
अपने लक्ष्य के समीप आकर तथा हनुमान की उल्लासमयी अवस्था को देखकर नारद जी अनायास स्वयं में ही इस प्रकार उल्लासमय भाव व्यक्त करने लगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)