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श्लोक 1.4.53  |
मद्-अनुक्तं च माहात्म्यं
तस्य वेत्ति परं भवान्
गत्वा किम्पुरुषे वर्षे
दृष्ट्वा तं मोदम् आप्नुहि |
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| अनुवाद |
| आप उनकी उन महिमाओं को अवश्य जानते हैं जिनका मैंने उल्लेख नहीं किया है। क्यों न आप स्वयं किंपुरुष-वर्ष जाकर उनके दर्शन करें और आनंदित हों? |
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| You certainly know His glories that I have not mentioned. Why not go to Kimpurusha-varsa yourself and see Him and be delighted? |
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