श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  1.4.50 
आत्मानं नित्य-तत्-कीर्ति-
श्रवणेनोपधारयन्
तन्-मूर्ति-पार्श्वतस् तिष्ठन्
राजते ’द्यापि पूर्व-वत्
 
 
अनुवाद
वे भगवान राम की महिमा का निरंतर श्रवण करके स्वयं को जीवित रखते हैं। भगवान के श्रीविग्रह के समीप रहकर, वे आज भी उसी वैभव के साथ विद्यमान हैं, जैसे सदैव थे।
 
They sustain themselves by constantly listening to the glories of Lord Rama. By remaining close to the Lord's Deity, they remain as radiant today as ever.
तात्पर्य
हनुमान को श्री रामचंद्र जी से विरह का कष्ट असहनीय रहता, किंतु वे सदा श्रवण कीर्तन के आनंद में तल्लीन होकर ही विरह को सहन कर पाए हैं। किंपुरुषों में श्रेष्ठ गायक ऋषभसेन जैसे किंपुरुष हनुमान को सुमधुर आवाज में श्री रामचंद्र जी के यश का गान सुना कर उन्हें सहारा देते हैं। हनुमान किंपुरुष लोक में श्री राम की नित्य स्थापित मूर्ति के पास ही रहते हैं। वे उस मूर्ति की नियमित भाँति पूजा करते हैं और उसी तरह से सेवा करते हैं जैसे वे प्रभु के साथ रहते हुए किया करते थे। श्रीमद् भागवत (5.19.1-2) में वर्णन किया गया है:

किंपुरुषे वर्षे भगवंतम् आदि-पुरुषं लक्ष्मणांग्रजं सीताबिरामं रामं तच्चरण-सन्निकर्षाभिरतः परम भागवतो हनुमान् सह किंपुरुषैरविरत भक्तिरुपास्ते। ऋषिषेणेन सह गंधर्वैरनुगीयमानं परम-कल्याणीं भर्तृ भगवत-कथां समुपश्रृणोति स्वयं चेदं गायति।

"हे राजन, किंपुरुष वर्ष में महान भक्त हनुमान हमेशा वहाँ के निवासियों के साथ श्री रामचन्द्र जी की, जो लक्ष्मण के बड़े भाई और सीतादेवी के प्रियतम हैं, भक्तिपूर्वक आराधना में लगे रहते हैं। अनेक गंधर्व हमेशा श्री रामचन्द्र जी के यश का गान करने में लगे रहते हैं। वह कीर्तन सदैव अत्यंत मंगलकारी होता है। हनुमान जी और किंपुरुष वर्ष के प्रमुख व्यक्ति ऋषभसेन सदा उन यशों को पूर्ण ध्यान से सुनते रहते हैं। हनुमान जी विभिन्न मंत्रों का जाप किया करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)