श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.4.5 
यया स्व-पित्रा विहिताः सहस्रम्
उपद्रवा दारुण-विघ्न-रूपाः
जितास् त्वया यस्य तवानुभावात्
सर्वे ’भवन् भागवता हि दैत्याः
 
 
अनुवाद
उस शुद्ध भक्ति के बल पर, तुमने भयंकर बाधाओं को पार कर लिया, तुम्हारे पिता ने तुम्हारे विरुद्ध हजारों अत्याचार किए थे। और तुम्हारे प्रभाव से सभी राक्षस वैष्णव बन गए।
 
By the power of that pure devotion, you overcame the terrible obstacles your father had committed against you, the thousands of atrocities he committed against you. And through your influence all the demons became Vaishnavas.
तात्पर्य
प्रह्लाद के पिता, हिरण्यकश्यिप, भगवान विष्णु और उनके भक्तों के सबसे बड़े शत्रु थे। प्रह्लाद ने हिरण्यकश्यिप के शत्रुओं की पार्टी में शामिल होने पर जोर दिया, और इसलिए हिरण्यकश्यिप ने उसे मारने की कोशिश की। लेकिन क्योंकि प्रभु ने प्रह्लाद की पूरी तरह से रक्षा की थी, कई प्रयासों के बावजूद उसके राक्षस पिता उसे मारने में विफल रहे। यह श्रीमद्-भागवतम (7.5.42-44) के सातवें कैंटो में संबंधित है:

प्रयासेऽपहते तस्मिन्

दैत्येन्द्रो परिषङ्कितः

चकार तद्वधोपायान्

निर्बन्धेन युधिष्ठिर

दिग्गजैर्दण्डशूकेन्द्रैर

अभिचारावपातनैः

मायाभिः सन्निरोधैश्च

गरदानािरभोजनैः

हिमवाय्वग्नि सलिलाइः

पर्वताक्रमणैरपि

“मेरे प्रिय राजा युधिष्ठिर, जब प्रह्लाद महाराज को मारने के राक्षसों के सभी प्रयास निरर्थक साबित हुए, तो राक्षसों के राजा, हिरण्यकश्यिप, जो सबसे भयभीत थे, ने उन्हें मारने के अन्य साधनों का इंतजाम करना शुरू किया। हिरण्यकश्यिप अपने बेटे को बड़े हाथियों के पैरों तले फेंकने, उसे भारी, भयावह सांपों के बीच फेंकने, विनाशकारी मंत्रों का प्रयोग करके, उसे पहाड़ी की चोटी से फेंकने, मायावी तरकीबें अपनाने, जहर देने, उसे भूखा रखने, उसे भयंकर ठंड, हवाओं के सामने उजागर करके नहीं मार सका। आग, और पानी, या उसे कुचलने के लिए भारी पत्थर फेंकना।”

छोटे वैष्णव हिरण्यकश्यिप द्वारा लगाए गए गंभीर प्रकार के कष्टों को प्रह्लाद की तरह दृढ़ता से सहन नहीं कर पाएंगे। इस तरह की पीड़ाओं का सामना करते हुए, भगवान के व्यक्तित्व के स्मरण में पूरी तरह से समर्पित और तल्लीन नहीं होने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभु की सेवा जारी रखने का साहस और दृढ़ संकल्प खो देगा। लेकिन इनमें से किसी भी परीक्षा ने प्रह्लाद को उनकी भक्ति सेवा से विचलित नहीं किया। भक्ति-योग में दृढ़ता से स्थिर होने के कारण, प्रह्लाद को प्रभावी ढंग से प्रचार करने के लिए सशक्त किया गया था; विष्णु के राक्षस शत्रुओं के पुत्र प्रह्लाद के निर्देशों को सुनकर और यहां तक कि उसे छूने या देखने से वैष्णव बन गए। इसलिए हरि-भक्ति-सुधोदय (13.7) में, जो नारद पुराण का हिस्सा है, पृथ्वी की देवी, धरणी-देवी, इस प्रकार प्रह्लाद की विशेष शक्ति का महिमामंडन करती हैं:

अहो कृतार्थः सुतरामृ नृलको

यस्मिन् स्थितो भगवतोत्तमोऽसि

स्पृशंति पश्यंति च ये भवन्त

भावान् च यांस्ते हरिलोकाभागाः

"आह, यह मानव दुनिया अब विशेष रूप से भाग्यशाली है क्योंकि आप वैष्णवों में श्रेष्ठ हैं। जो कोई भी आपको छूता है या आपको और आपकी तल्लीन भावनाओं के लक्षण देखता है, वह हरिलोक में निवास करने का हकदार हो जाएगा।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)