प्रयासेऽपहते तस्मिन्
दैत्येन्द्रो परिषङ्कितः
चकार तद्वधोपायान्
निर्बन्धेन युधिष्ठिर
दिग्गजैर्दण्डशूकेन्द्रैर
अभिचारावपातनैः
मायाभिः सन्निरोधैश्च
गरदानािरभोजनैः
हिमवाय्वग्नि सलिलाइः
पर्वताक्रमणैरपि
“मेरे प्रिय राजा युधिष्ठिर, जब प्रह्लाद महाराज को मारने के राक्षसों के सभी प्रयास निरर्थक साबित हुए, तो राक्षसों के राजा, हिरण्यकश्यिप, जो सबसे भयभीत थे, ने उन्हें मारने के अन्य साधनों का इंतजाम करना शुरू किया। हिरण्यकश्यिप अपने बेटे को बड़े हाथियों के पैरों तले फेंकने, उसे भारी, भयावह सांपों के बीच फेंकने, विनाशकारी मंत्रों का प्रयोग करके, उसे पहाड़ी की चोटी से फेंकने, मायावी तरकीबें अपनाने, जहर देने, उसे भूखा रखने, उसे भयंकर ठंड, हवाओं के सामने उजागर करके नहीं मार सका। आग, और पानी, या उसे कुचलने के लिए भारी पत्थर फेंकना।”
छोटे वैष्णव हिरण्यकश्यिप द्वारा लगाए गए गंभीर प्रकार के कष्टों को प्रह्लाद की तरह दृढ़ता से सहन नहीं कर पाएंगे। इस तरह की पीड़ाओं का सामना करते हुए, भगवान के व्यक्तित्व के स्मरण में पूरी तरह से समर्पित और तल्लीन नहीं होने वाला कोई भी व्यक्ति प्रभु की सेवा जारी रखने का साहस और दृढ़ संकल्प खो देगा। लेकिन इनमें से किसी भी परीक्षा ने प्रह्लाद को उनकी भक्ति सेवा से विचलित नहीं किया। भक्ति-योग में दृढ़ता से स्थिर होने के कारण, प्रह्लाद को प्रभावी ढंग से प्रचार करने के लिए सशक्त किया गया था; विष्णु के राक्षस शत्रुओं के पुत्र प्रह्लाद के निर्देशों को सुनकर और यहां तक कि उसे छूने या देखने से वैष्णव बन गए। इसलिए हरि-भक्ति-सुधोदय (13.7) में, जो नारद पुराण का हिस्सा है, पृथ्वी की देवी, धरणी-देवी, इस प्रकार प्रह्लाद की विशेष शक्ति का महिमामंडन करती हैं:
अहो कृतार्थः सुतरामृ नृलको
यस्मिन् स्थितो भगवतोत्तमोऽसि
स्पृशंति पश्यंति च ये भवन्त
भावान् च यांस्ते हरिलोकाभागाः
"आह, यह मानव दुनिया अब विशेष रूप से भाग्यशाली है क्योंकि आप वैष्णवों में श्रेष्ठ हैं। जो कोई भी आपको छूता है या आपको और आपकी तल्लीन भावनाओं के लक्षण देखता है, वह हरिलोक में निवास करने का हकदार हो जाएगा।"
