श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  1.4.49 
सीता-प्रमोदनः स्वामि-
सत्-प्रसादैक-भाजनम्
आज्ञयात्मेश्वरस्यात्र
स्थितो ’पि विरहासहः
 
 
अनुवाद
हनुमान जी ने ही माता सीता को प्रोत्साहित किया था। और प्रभु की आज्ञा से, अपने स्वामी के एकमात्र कृपापात्र, ये हनुमान आज भी इस संसार में जीवित हैं, यद्यपि प्रभु से वियोग सहन नहीं कर पा रहे हैं।
 
It was Hanuman who encouraged Mother Sita. And by the Lord's command, Hanuman, the only blessed one of his masters, is still alive in this world, though he is unable to bear the separation from his Lord.
तात्पर्य
भगवान् रामचंद्र द्वारा रावण का युद्ध में वध करने के पश्चात् हनुमान माँ सीता को अशोक वाटिका में यह शुभ समाचार ले गए। इससे सीता जी फिर से जीवन पा गईं, और जब हनुमान उन्हें उनके पति से मिलने ले गए तो उनका जीवन पूर्णत: आनंदमय हो गया। इस प्रकार हनुमान ने भगवान् राम और उनके प्रिय भक्तों की अनेक प्रकार से स्वागत सेवा की। इसका वर्णन करने के बाद, प्रह्लाद आगे हनुमान की सेवा के लिए उन्हें मिलने वाले प्रतिफलों का वर्णन करते हैं। जब भगवान रामचंद्र अयोध्या के राजा बने, तो उन्होंने हनुमान पर विशेष अनुग्रह करते हुए उन्हें माँ सीता का स्वर्णहार भेंट किया। इससे भी अधिक, उन्होंने हनुमान को अपने प्रति अविचल भक्ति प्रदान की।

चूँकि विजय के पश्चात् भगवान रामचंद्र के साथ हनुमान का जीवन अत्यधिक सौभाग्यशाली था, इसलिए यह प्रश्न उठ सकता है कि हनुमान कभी भगवान् की संगति को कैसे छोड़ सकते थे। वह अन्य निवासियों सहित भगवान् राम के साथ वैकुंठ में अयोध्या क्यों नहीं लौटे? इसका उत्तर यह है कि उनके भगवान् ने विशेष रूप से उनसे पृथ्वी पर ही रहने को कहा। आत्मेश्वर का अर्थ है "उनके अपने भगवान्" और इसका अर्थ "सभी आत्माओं के भगवान्" भी है। दूसरे शब्दों में, इस दुनिया में रहकर हनुमान ने उसके सभी निवासियों को विशुद्ध भक्ति सेवा के मार्ग पर चलने का एक बेहतर अवसर दिया। भगवान् रामचंद्र ने हनुमान को यह कठिन त्याग करने का आदेश इसलिए दिया क्योंकि भगवान् संसारी जीवों पर ऐसी कृपा करना चाहते थे। भगवान् से वियोग में रहना हनुमान का सबसे कठिन और गौरवशाली सेवा कार्य है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)