श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.4.35 
प्राकट्येन सदात्रासौ
द्वारे वर्तेत चेत् प्रभुः
किं यायां नैमिषं दूरं
द्रष्टुं तं पीत-वाससम्
 
 
अनुवाद
यदि मेरे भगवान सदैव यहां साक्षात् उपस्थित रहते, तो मैं भगवान पीतवसा, नारायण के पीतवस्त्रधारी रूप के दर्शन हेतु नैमिषारण्य तक क्यों आती?
 
If my Lord was always present here in person, why would I come all the way to Naimisharanya to see the yellow-clad form of Lord Pitavasa, Narayana?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)