श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.4.34 
यस्य श्री-भगवत्-प्राप्ताव्
उत्कटेच्छा यतो भवेत्
स तत्रैव लभेतामुं
न तु वासो ’स्य लाभ-कृत्
 
 
अनुवाद
जहाँ कहीं भी मनुष्य में भगवान को पाने की तीव्र इच्छा जागृत होती है, वहाँ वह उन्हें प्राप्त कर सकता है। किन्तु भगवान का किसी स्थान पर निवास मात्र से ही उनका सानिध्य प्राप्त नहीं हो जाता।
 
Wherever a person has a strong desire to find God, he can find Him. However, merely having God in a place does not equate to His presence.
तात्पर्य
भगवान का व्यक्तित्व स्वयं को उन लोगों के समक्ष प्रकट नहीं करता जिनकी इच्छाएँ पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होती हैं। केवल परिपूर्ण प्रेम ही उन्हें स्वयं को प्रकट करने के लिए प्रेरित कर सकता है। यदि किसी स्थान में भगवान की उपस्थिति उन्हें साकार करने का एक पर्याप्त कारण होती, तो ब्रह्मांड में प्रत्येक जीवित प्राणी को पहले से ही उन्हें प्राप्त कर लेना चाहिए था, क्योंकि श्री वासुदेव, परमात्मा के रूप में वह सर्वव्यापी हैं।

पवित्र भक्त आश्वस्त हैं कि भगवान स्थायी रूप से पृथ्वी पर प्रकट हुए अपने शाश्वत निवास में उपस्थित हैं। हालाँकि, वह आश्वासन भक्तों की भगवान के साथ अपने व्यक्तिगत संबंध को साकार करने की प्रबल उत्सुकता से उत्पन्न होता है। उस तीव्र इच्छा के बिना, किसी को भी उनकी उपस्थिति में बहुत अधिक विश्वास नहीं होगा। यह सच है कि श्री वृंदावन और परम भगवान के कुछ अन्य निवास स्थानों में, कभी-कभी अपरिपक्व विश्वास वाले भक्तों को भी भगवान और उनके लीलाओं का दर्शन दिया जाता है। लेकिन हमें समझना चाहिए कि यह केवल इन स्थानों की विशेष क्षमता के कारण होता है, जो भगवान के व्यक्तित्व को असाधारण रूप से प्रिय हैं। आजकल भगवान स्वयं को उतनी आसानी से हर उस पवित्र स्थान पर प्रकट नहीं करते हैं जहां वह अतीत में प्रकट हुए थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)