श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.4.33 
कदाचित् कार्य-गत्यैव
दृश्यते रावणादि-वत्
दुर्वाससेक्षितो ’त्रैव
विश्वासात् तस्य दर्शने
 
 
अनुवाद
कभी-कभार ही रावण जैसे कुछ लोग यहाँ भगवान के दर्शन कर पाते हैं। भगवान तभी प्रकट होते हैं जब यह उनके अपने प्रयोजन के अनुकूल हो। इस प्रकार उन्होंने दुर्वासा को इसी स्थान पर दर्शन दिए क्योंकि दुर्वासा को भगवान के दर्शन करने में दृढ़ विश्वास था।
 
Only a few people, like Ravana, are able to see the Lord here. The Lord appears only when it suits His own purposes. Thus, He appeared to Durvasa at this very spot, because Durvasa had strong faith in the Lord's presence.
तात्पर्य
पाताळ के क्षेत्र पर आक्रमण करते समय, रावण बलि महाराज की राजधानी के द्वार पर आया, पर द्वार पर हाथ में गदा लिए हुए भगवान वामन ने रावण को अंदर जाने से रोक दिया और उपेक्षापूर्वक उसे बहुत दूर किक करके फेंक दिया। प्रहलाद का तर्क है कि यह बलि के द्वार पर श्री वामन की निरंतर उपस्थिति का प्रमाण नहीं है। भगवान वामन एक विशेष उद्देश्य से, बलि को रावण द्वारा विजय प्राप्त किए जाने से बचाने के लिए, इस एक अवसर पर वहाँ प्रकट हुए थे।

एक अन्य अवसर पर दुर्वासा, जो कुशस्थली में tinggal रहे थे, जो द्वारका के भविष्य के शहर का स्थल था, राक्षस कुश और उनके सहचरों, कुशस्थली के प्राचीन रक्षकों से परेशान थे। दुर्वासा भगवान वामन से मदद मांगने के लिए सुतल गए। जैसाकि स्कंद पुराण (प्रभास-खंड 4.18) के द्वारका-माहात्म्य में संबंधित है, यह नारद थे जिन्होंने दुर्वासा को सुतल में भगवान वामन के पास जाने की सलाह दी थी और दुर्वासा को आश्वासन दिया था कि वह वास्तव में वहाँ भगवान वामन को पाएँगे। क्योंकि दुर्वासा ने नारद के शब्दों पर भरोसा किया था, भगवान वामन ने दुर्वासा को अपने दर्शन देकर उनके सत्य को कायम रखा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)