एक अन्य अवसर पर दुर्वासा, जो कुशस्थली में tinggal रहे थे, जो द्वारका के भविष्य के शहर का स्थल था, राक्षस कुश और उनके सहचरों, कुशस्थली के प्राचीन रक्षकों से परेशान थे। दुर्वासा भगवान वामन से मदद मांगने के लिए सुतल गए। जैसाकि स्कंद पुराण (प्रभास-खंड 4.18) के द्वारका-माहात्म्य में संबंधित है, यह नारद थे जिन्होंने दुर्वासा को सुतल में भगवान वामन के पास जाने की सलाह दी थी और दुर्वासा को आश्वासन दिया था कि वह वास्तव में वहाँ भगवान वामन को पाएँगे। क्योंकि दुर्वासा ने नारद के शब्दों पर भरोसा किया था, भगवान वामन ने दुर्वासा को अपने दर्शन देकर उनके सत्य को कायम रखा।
