श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.4.29 
अन्यथा किं विशालायां
प्रभुणा विश्रुतेन मे
पुनर् जाति-स्वभावं तं
प्राप्तस्येव रणो भवेत्
 
 
अनुवाद
अन्यथा मैं विशाला में प्रसिद्ध भगवान के विरुद्ध क्यों लड़ता, मानो मैं अपने जन्म की निम्न संस्कार-प्रथा पर लौट आया हूँ?
 
Otherwise why would I fight against the famous Lord in Vishala, as if I had returned to the low ritual practices of my birth?
तात्पर्य
इस पद में प्रह्लाद ने उस प्रकार की तर्क पद्धति का सहारा लिया है जिसे तकनीकी रूप से अन्यथा-अनुपपत्ति या "नकारात्मक परिकल्पना" के रूप में जाना जाता है। तर्क का यह रूप इस प्रकार कार्य करता है: देवदत्त मोटा है, लेकिन हम उसे दिन के दौरान खाते हुए नहीं देखते हैं। इसलिए, उसे रात में तब खाना होगा जब बाकी सभी सो रहे होंगे। रात में उसके खाने की बिना कल्पना किए हम उसके मोटापे की व्याख्या नहीं कर सकते। इसी प्रकार, प्रह्लाद यहाँ तर्क देता है कि भगवान नर-नारायण के खिलाफ लड़ने को समझाने का कोई तरीका नहीं है, लेकिन यह स्वीकार करना कि भगवान के लिए उनकी भक्ति ग्रहण हो गई है। नर-नारायण के नाम से ज्ञात रूपों में भगवद् व्यक्तित्व का दोहरा अवतार भक्ति तपस्या कैसे की जाए, यह सिखाने के लिए प्रकट हुए। वे हिमालय में, विशाला और बदरीका के नाम से विविध रूप से प्रसिद्ध स्थान पर निवास करते हैं। श्रीमद्-भागवतम् के प्रथम और चतुर्थ सर्ग इस अवतार पर चर्चा करते हैं:

तुर्ये धर्म-कला-सर्गे

नर-नारायणाव ṛṣī

भूत्वात्मोपशमोपेतम्

अकरोद् दुश्चरं तपः

"चौथे अवतार में, भगवान नर और नारायण बने, जो राजा धर्म की पत्नी के जुड़वां पुत्र थे। इस प्रकार उन्होंने इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए कठोर और अनुकरणीय तपस्या की।" (भागवत1.3.9)

एवं सुर-गणैस्तात

भगवंतवाभिष्टुताऊ

लभ्धावलोकैर्ययतुर

अर्चितौ गंधमादनम्

"इस प्रकार देवताओं ने प्रार्थनाओं के साथ परमेश्वर की पूजा की जो कि ऋषि नर-नारायणके रूप में प्रकट हुए। भगवान ने उन पर दया की दृष्टि डाली और फिर गंधमादन पर्वत के लिए प्रस्थान किया।" (भागवत 4.1.58)

प्रह्लाद "मेरे जन्म की कंडीशनिंग" को संदर्भित करता है; राक्षसों का वंशज होने के नाते, भगवान विष्णु और वैष्णवों के प्राकृतिक दुश्मन, उनके लिए सीधे तौर पर उल्लेख करने के लिए बहुत ही अप्रिय थे। उससे भी अधिक अकथनीय यह था कि वह विष्णु के सबसे प्रबल घृणा करने वालों में से एक का पुत्र था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)