तुर्ये धर्म-कला-सर्गे
नर-नारायणाव ṛṣī
भूत्वात्मोपशमोपेतम्
अकरोद् दुश्चरं तपः
"चौथे अवतार में, भगवान नर और नारायण बने, जो राजा धर्म की पत्नी के जुड़वां पुत्र थे। इस प्रकार उन्होंने इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए कठोर और अनुकरणीय तपस्या की।" (भागवत1.3.9)
एवं सुर-गणैस्तात
भगवंतवाभिष्टुताऊ
लभ्धावलोकैर्ययतुर
अर्चितौ गंधमादनम्
"इस प्रकार देवताओं ने प्रार्थनाओं के साथ परमेश्वर की पूजा की जो कि ऋषि नर-नारायणके रूप में प्रकट हुए। भगवान ने उन पर दया की दृष्टि डाली और फिर गंधमादन पर्वत के लिए प्रस्थान किया।" (भागवत 4.1.58)
प्रह्लाद "मेरे जन्म की कंडीशनिंग" को संदर्भित करता है; राक्षसों का वंशज होने के नाते, भगवान विष्णु और वैष्णवों के प्राकृतिक दुश्मन, उनके लिए सीधे तौर पर उल्लेख करने के लिए बहुत ही अप्रिय थे। उससे भी अधिक अकथनीय यह था कि वह विष्णु के सबसे प्रबल घृणा करने वालों में से एक का पुत्र था।
