प्रह्लाद इसका उत्तर भौतिक चिंताओं से खुद को परेशान बताते हुए देते हैं, एक ऐसी स्थिति जो उन्हें स्वतः ही नाम-स्मरण, रूप-स्मरण और लीला-स्मरण से अयोग्य घोषित करती है। एक और तर्क भी निहित है, कि स्मरण भक्ति सेवा का सबसे अच्छा रूप नहीं है, क्योंकि यह मन के कार्यों पर निर्भर करता है, जो चिंता और अन्य भावनाओं से विचलित होने के अधीन हैं। इस तर्क को "गोलोक की महिमा" में बाद में अधिक विस्तार से बताया जाएगा।
