श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.4.20 
हनूमद्-आदि-वत् तस्य
कापि सेवा कृतास्ति न
परं विघ्नाकुले चित्ते
स्मरणं क्रियते मया
 
 
अनुवाद
मैंने हनुमानजी व अन्य लोगों की तरह कभी भी भगवान की सच्ची सेवा नहीं की। मैंने केवल कभी-कभी, जब मेरा मन व्याकुल होता था, भगवान को याद किया है।
 
I have never truly served God like Hanumanji and others. I have only remembered Him occasionally, when my mind was troubled.
तात्पर्य
" परन्तु तुम भगवान विष्णु के भक्त हो," नारद ने कहा होगा, "और इसीलिए तुम उनकी दया के पात्र हो।" प्रह्लाद ने अन्य लोगों, जैसे हनुमान से अपनी तुलना करके उत्तर दिया है, जो भगवान की सक्रिय रूप से सेवा करते हैं। प्रह्लाद कहते हैं, "अभी भी," "मैं केवल ध्यान का अभ्यास कर रहा हूं, मैं अभी भी एक निष्क्रिय ध्यान करने वाले के रूप में भी कुशल नहीं बना हूं।" नारद इसके बदले में तर्क दे सकते हैं कि भगवान पर अपने मन को एकाग्र करना शुद्ध भक्ति सेवा के नौ तरीकों में से एक है। भगवान के नामों, रूपों और लीलाओं को याद रखना भक्ति-योग में आत्म-साक्षात्कार के उच्चतम स्तर पर है। क्योंकि सेवा का अर्थ है भक्ति सेवा, प्रह्लाद को यह दिखाने के लिए इस शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए कि उसने कभी भगवान की सेवा नहीं की है।

प्रह्लाद इसका उत्तर भौतिक चिंताओं से खुद को परेशान बताते हुए देते हैं, एक ऐसी स्थिति जो उन्हें स्वतः ही नाम-स्मरण, रूप-स्मरण और लीला-स्मरण से अयोग्य घोषित करती है। एक और तर्क भी निहित है, कि स्मरण भक्ति सेवा का सबसे अच्छा रूप नहीं है, क्योंकि यह मन के कार्यों पर निर्भर करता है, जो चिंता और अन्य भावनाओं से विचलित होने के अधीन हैं। इस तर्क को "गोलोक की महिमा" में बाद में अधिक विस्तार से बताया जाएगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)