नेमं विरिंचो लभते प्रसादं
ना श्रीर् ना शर्वः किं उतापरे ये
यन नोऽसुराणामसि दुर्ग-पालो
विश्वाभिवंद्यैरभिवंदितांघ्रिः
"हे परमेश्वर भगवान, आपको सार्वभौमिक रूप से पूजा जाता है; यहाँ तक कि भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव भी आपके चरण कमलों की पूजा करते हैं। फिर भी यद्यपि आप इतने महान व्यक्तित्व हैं, आपने कृपा करके हमारी रक्षा करने का वादा किया है, असुरों की। मुझे लगता है कि भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव या भाग्य की देवी लक्ष्मी ने भी ऐसी कृपा कभी प्राप्त नहीं की है, दूसरे देवताओं या आम लोगों की तो बात ही क्या।" (भागवतम् 8.23.6)
स्कंद पुराण की प्रहलाद-संहिता, द्वारका-धाम की महिमा का वर्णन करने वाले अध्यायों में, निम्नलिखित इतिहास भी संबंधित है। जब एक बार द्वारका शहर पर दस शक्तिशाली दैत्यों ने हमला किया था, तो निवासियों की एक समिति, जिसका नेतृत्व दुर्वासा ऋषि कर रहे थे, बड़ी व्यथा में बली दैत्यराज के निवास पर गए। वहाँ ऋषि दुर्वासा ने भगवान वामनदेव से विनती की कि वे उनकी रक्षा के लिए द्वारका आएँ, लेकिन भगवान ने उत्तर दिया:
पराधीनोऽस्मि विप्रेन्द्र
भक्ति-क्रीतोऽस्मि नान्यथा
बलैर आदेश-कारी च
दैत्येन्द्र-वश-गो ह्य अहम
तस्मात् प्रार्थय विप्रेन्द्र
दैत्यं वैरोचनं बलिम
अस्यादेशात करिष्यामि
यद् अभिष्टं तवादुना
"हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। क्योंकि मैं विशुद्ध भक्ति द्वारा खरीदा गया हूँ और उसी द्वारा ही, अब मैं बली का आज्ञावाहक हूँ। मैं उस दैत्यों के राजा के पूर्ण नियंत्रण में हूँ। इसलिए, हे मेरे श्रेष्ठ ब्राह्मण, कृपया दैत्य बली से, विरोचन के पुत्र से पूछें और यदि वह आदेश दे तो मैं तुरंत वही करूँगा जो आप चाहते हैं।" (स्कंद पुराण, प्रभाखंड 4.19.2-3) पर जब दुर्वासा ने अपनी प्रार्थना बाली महाराज के सामने प्रस्तुत की, तो बली ने भगवान वामन को सुतल लोक छोड़ने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। दुर्वासा द्वारा मृत्यु तक उपवास करने का इरादा व्यक्त करने के बाद भी, बली ने उनसे कहा:
यद् भाव्यं तद् भवतु ते
यज जानासि तथा कुरु
ब्रह्म-रुद्रादी-नमितं
नाहं त्यक्ष्ये पद-द्वयं
"जो कुछ भी आपका इरादा है, उसे पूरा होने दें। आपके मन में जो कुछ भी हो, कृपया वह करें। लेकिन मैं उन दो चरणों को कभी नहीं छोडूँगा जिन पर ब्रह्मा, रुद्र और अन्य सभी देवता नमन करते हैं।" (स्कंद पुराण 7.4.19.16)
