श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  1.4.110 
बृहद्-व्रत-धरान् अस्मांस्
तांश् च गार्हस्थ्य-धर्मिणः
साम्राज्य-व्यापृतान् मत्वा
मापराधावृतो भव
 
 
अनुवाद
कृपया अपनी बुद्धि को इस आपत्तिजनक विचार से ढकने न दें कि आप और मैं कट्टर ब्रह्मचारी हैं और पांडव केवल गृहस्थ हैं, जो राजनीतिक मामलों में उलझे हुए हैं।
 
Please do not let your intellect be clouded by the objectionable idea that you and I are staunch celibates and the Pandavas are mere householders, who are entangled in political affairs.
तात्पर्य
इस श्लोक मे हनुमान किसी भी शंका को दूर करते हैं। कोई यह सोच सकता है कि पाण्डव धनवान हैं और इन्द्रियों के भोगी हैं तथा उनके साथ जुड़ कर हनुमान और नारद जैसी वैरागियों को बचना चाहिए। हनुमान एस्मान के बहुवचन रूप का इस्तेमाल करते हैं जिसमे चारो कुमार और अन्य आजीवन ब्रह्मचारी शामिल हैं। केवल यह सोचना कि पाण्डव भौतिकवादी हैं, उनके खिलाफ कुछ कहे बिना भी, शुद्ध वैष्णव का घोर अपमान है। इस अपमान से सम्बंधित व्यक्ति कभी भी उबर नहीं पाता है। इसलिए नारद को इस तरह से सोचना शुरू नहीं करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)