श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  1.4.109 
स्वयम् एव प्रसन्नं यन्
मुनि-हृद्-वाग्-अगोचरम्
मनोहर-तरं चित्र-
लीला-मधुरिमाकरम्
 
 
अनुवाद
भगवान कृष्ण स्वयं में पूर्णतः संतुष्ट हैं। बड़े-बड़े ऋषिगण भी उन्हें अपने हृदय में अनुभव नहीं कर सकते, न ही वाणी से उनका वर्णन कर सकते हैं। वे परम मोहक हैं क्योंकि उनकी अद्भुत लीलाएँ अनंत आकर्षण का स्रोत हैं।
 
Lord Krishna is completely content within himself. Even great sages cannot experience him in their hearts, nor can words describe him. He is supremely captivating, for his wondrous pastimes are a source of endless fascination.
तात्पर्य
पाण्डवों ने आत्म-ज्ञान के लिए कोई साधना नहीं अपनाई थी, फिर भी भगवान श्री कृष्ण उनके भक्ति पूर्ण व्यवहार से इतने संतुष्ट थे कि उन्होंने उन पर अपनी पूर्ण कृपा बरसाई, जो सिद्ध संतों को भी दुर्लभ रूप से प्राप्त होती है। इस प्रकार, पाण्डव हमेशा के लिए सबसे अनन्य सौभाग्य का आनंद लेते हैं। वह परम आकर्षक भगवान, जिनकी लीलाएँ मधुर विविधता से भरी हैं और जो कामदेव सहित सभी अन्य आकर्षक व्यक्तियों के स्रोत हैं, के साथ घनिष्ठ मित्रता में रहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)