श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  1.4.107 
किं वा मद्-विषय-स्नेह-
प्रेरितः प्राणतो मम
रूपं प्रिय-तमं यत् तत्
सन्दर्शयितुम् ईश्वरः
 
 
अनुवाद
अथवा, मेरे प्रति स्नेह से प्रेरित होकर, प्रभु मुझे बुला सकते हैं, ताकि मुझे वह सुंदर रूप दिखा सकें जिसे मैं अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करता हूँ।
 
Or, moved by affection for me, the Lord may call me, to show me the beautiful form of the One whom I love more than my life.
तात्पर्य
अब नारद ने यह उत्तर दिया कि श्री कृष्ण वास्तव में चाहते हैं कि वह दोनों द्वारका आ जाएँ, हनुमान को भगवान की इच्छा को पूरा करने के लिए सहमति देनी चाहिए। यह अनुमान करते हुए, हनुमान ने किंपुरुष-लोक में अपना स्थान न छोड़ने का एक और कारण प्रस्तुत किया। भगवान रामचंद्र को छोड़ने से उनके लिए अपनी जान दे देना आसान होगा। किंपुरुष-लोक में, हनुमान अलगाव में अपने भगवान की सेवा करते हैं और हर पल प्रभु के सौंदर्य और उनके लीलाओं के आकर्षण का पूरा आनंद नहीं ले पाते हैं। परंतु यदि अयोध्या में भगवान रामचंद्र के पास बुलाया गया, तो केवल कुछ समय के लिए ही सही, हनुमान बिना सोचे-समझे किंपुरुष-लोक को छोड़ देंगे। वह कभी किसी अन्य उद्देश्य से नहीं जा सकते थे।

एक जिज्ञासु कहानी इस सेवा भाव को और अधिक स्पष्ट करती है। एक बार द्वारका में भगवान कृष्ण ने वैष्णव भक्ति की अडिग विशिष्टता को दिखाकर गरुड़ और अन्य लोगों के अभिमान को तोड़ना चाहा। इसलिए उन्होंने गरुड़ को अपने कमल चरणों में बुलाया और उनसे कहा, "कृपया मेरी आज्ञा सुनें। आपको किंपुरुष-लोक से हनुमान को लाना चाहिए।" गरुड़ गए, हनुमान से मिले और उनसे कहा, "भगवान के व्यक्तित्व, यादवों के राजा, आपको बुला रहे हैं, मेरे प्रिय हनुमान। तुरंत उनके पास जाओ।" लेकिन श्री रघुनाथ के प्रति विशेष रूप से समर्पित, हनुमान ने गरुड़ के अनुरोध को अनदेखा कर दिया। क्रोधित होकर, गरुड़ ने हनुमान को बलपूर्वक कृष्ण के पास ले जाने की कोशिश की, लेकिन हनुमान ने अपनी पूंछ की नोक से उन्हें आसानी से दूर धकेल दिया।

गरुड़ आकाश से गिरकर द्वारका में उतरे, जहाँ कृष्ण ने उन्हें देखकर मनोरंजन किया और कहा, "प्रिय गरुड़, हनुमान के पास वापस जाओ और उन्हें बताओ कि श्री रघुनाथ उन्हें बुला रहे हैं।" गरुड़ को फिर से भेजने के बाद, कृष्ण ने खुद को भगवान रामचंद्र में बदल लिया और श्री बलराम को लक्ष्मण बना दिया। जब रानी सत्यभामा सीतादेवी में बदलने में असमर्थ दिखाई दीं, तो कृष्ण ने हंसते हुए श्री रुक्मिणी को सीता बना दिया और उन्हें अपनी बाईं ओर बिठा दिया। फिर वे तीनों द्वारका में हनुमान की प्रतीक्षा करने लगे।

जब गरुड़ हनुमान से मिले और उन्हें भगवान के अनुरोध के बारे में बताया, तो हनुमान, परमानंद से भरे हुए, अपने प्रभु से मिलने के लिए दौड़ पड़े। उन्होंने प्रच्छन्न कृष्ण, बलराम और रुक्मिणी के दर्शन किए और भक्ति में प्रार्थना की। हनुमान से बहुत संतुष्ट होकर, भगवान ने उन्हें वह वरदान दिया जो हनुमान ने चुना।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)