श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  1.4.105 
तस्माद् अस्य वसाम्य् अत्र
तादृग् रूपम् इदं सदा
पश्यन् साक्षात् स एवेति
पिबंस् तच्-चरितामृतम्
 
 
अनुवाद
इसलिए मैं सोचता हूँ कि मैं यहीं रहूँगा, निरन्तर उन्हें इसी रूप में देखता रहूँगा और उनकी लीलाओं का अमर अमृत पीता रहूँगा।
 
Therefore I think that I will stay here, keep seeing Him in this form and keep drinking the immortal nectar of His Leelas.
तात्पर्य
मूलतः हनुमान कहते हैं कि वह स्वतंत्र नहीं है। वे अपनी इच्छा से कुछ भी कर अथवा जा नहीं सकते। यद्यपि वह जानते हैं कि भगवान श्री राम, श्री देवकीनंदन के ही विस्तार हैं, उन्हें भगवान रामचंद्र की भक्ति जारी रखनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)