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श्लोक 1.4.105  |
तस्माद् अस्य वसाम्य् अत्र
तादृग् रूपम् इदं सदा
पश्यन् साक्षात् स एवेति
पिबंस् तच्-चरितामृतम् |
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| अनुवाद |
| इसलिए मैं सोचता हूँ कि मैं यहीं रहूँगा, निरन्तर उन्हें इसी रूप में देखता रहूँगा और उनकी लीलाओं का अमर अमृत पीता रहूँगा। |
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| Therefore I think that I will stay here, keep seeing Him in this form and keep drinking the immortal nectar of His Leelas. |
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