श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  1.3.86 
अहो न सहते ’स्माकं
प्रणामं सज्-जनाग्रणीः
स्तुतिं च मा प्रमादी स्यास्
तत्र चेत् सुखम् इच्छसि
 
 
अनुवाद
दुर्भाग्य से, वह श्रेष्ठ संत पुरुष यह बर्दाश्त नहीं करेगा कि हम उसके आगे झुकें या उसकी स्तुति करें। अगर आप मुसीबत में पड़ने से बचना चाहते हैं, तो इस बात की उपेक्षा न करें।
 
Unfortunately, that great saintly person will not tolerate us bowing down to him or praising him. If you want to avoid getting into trouble, don't ignore this.
तात्पर्य
भगवान शिव नारद को चेतावनी देते हैं कि वे लापरवाह न हों और प्रह्लाद का आदर करें। यदि वह ऐसा करता है, तो प्रह्लाद दुखी हो जाएगा और नारद से बात करने या उसे देखने से भी इनकार कर देगा।
 
इस प्रकार श्रील सनातन गोस्वामी के बृहद-भगवतामृत के भाग एक का तीसरा अध्याय, “प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)”, समाप्त होता है।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)