श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  1.3.84 
केवलं तन्-महा-प्रेष्ठ-
प्रह्लाद-प्रीत्य्-अपेक्षया
किं ब्रूयां परम् अत्रास्ते
गौरी लक्ष्म्याः प्रिया सखी
 
 
अनुवाद
नहीं, दोनों ही मामलों में भगवान ने अपने परम प्रिय भक्त प्रह्लाद के प्रति स्नेहवश ऐसा किया। लेकिन देवी लक्ष्मी की घनिष्ठ सखी गौरी के समक्ष मैं इसके बारे में और क्या कह सकता हूँ?
 
No, in both cases the Lord did this out of affection for his most beloved devotee, Prahlada. But what more can I say about this in front of Gauri, the close friend of Goddess Lakshmi?
तात्पर्य
नारद प्रह्लाद महाराज की महिमा के बारे में और सुनना चाहते हैं, लेकिन भगवान शिव अपनी पत्नी को नाराज करने से डरते हैं। यदि वह प्रह्लाद की प्रशंसा में और अधिक कहेंगे, तो वह निस्संदेह एक आध्यात्मिक तन्द्रा में पड़ जायेंगे। यदि वह तब भी अधिक जोर से बोलते हैं, तो पार्वती सुन सकती है कि वह क्या कह रहे हैं। वह महालक्ष्मी की एक अच्छी दोस्त हैं और यह नहीं सुनना चाहेंगी कि प्रह्लाद भगवान की पत्नी से भी बड़े भक्त हैं। भगवान शिव चिंतित हैं कि यदि पार्वती नाराज हो गयीं, तो वह उनके और नारद के प्रति असम्मानपूर्वक व्यवहार करेंगी, और यह उनके लिए अच्छा नहीं होगा।

तर्क के अनुसार, प्रह्लाद जैसा भक्ति-मार्ग का नया व्यक्ति, देवी लक्ष्मी से श्रेष्ठ नहीं हो सकता है, जो सनातन रूप से भगवान नारायण के सीने पर निवास करती हैं, फिर भी प्रह्लाद को भगवान की विशेष कृपा प्राप्त हुई, जिसने उन्हें उस असंभावित स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। जब ब्रह्मा ने हिरण्यकशिपु को वरदान दिया जिसने उन्हें तीनों लोकों का संकट बना दिया, तो भगवान चिंतित हो गए कि उनकी भक्तों को अपने शत्रु को इतना शक्तिशाली बनते देख कर भक्ति-मार्ग में अपने विश्वास को कमज़ोर नहीं होने देना चाहिए। वैष्णवों की चिंताओं और संदेहों को दूर करने में मदद करने के लिए, हिरण्यकशिपु को मारने के तुरंत बाद, भगवान नृसिंह ने प्रह्लाद को अतीत और वर्तमान के अन्य सभी भक्तों से बड़ा बनने का आशीर्वाद दिया - जिनमें वैकुण्ठ के निवासी, उनके निजी अनुचर और उनकी प्रिय पत्नी लक्ष्मी भी शामिल हैं। इस आशीर्वाद को ध्यान में रखते हुए, भगवान शिव ने पाठ 75 में प्रह्लाद के बारे में कहा है, "आपके पिता, मुझे और गरुड़ जैसे अन्य सेवकों से भी, और यहाँ तक कि भाग्य की देवी से भी अधिक, कृष्ण की कृपा का एक बड़ा प्राप्तकर्ता है। उसका नाम प्रह्लाद है। वह दुनिया भर में कृष्ण के सबसे प्रिय भक्त के रूप में प्रसिद्ध है।" और पाठ 80 में: "जब भगवान ने हिरण्यकशिपु को टुकड़े-टुकड़े कर दिया, तो मैंने, सभी देवताओं ने और देवी लक्ष्मी ने अपनी आँखों से प्रह्लाद के अतुलनीय सौभाग्य को देखा।" इस प्रकार, भगवान की मधुर इच्छा से, प्रह्लाद सबसे महान वैष्णव बन गए, जो अन्यथा असंभव होता।

कभी-कभी भगवान विष्णु अन्य "हाल ही के" भक्तों जैसे प्रह्लाद को भगवान संकर्षण, महा लक्ष्मी और वैकुण्ठ के शाश्वत राज्य के अन्य महान व्यक्तित्वों से भी अधिक प्रिय घोषित करते हैं। श्री कृष्ण उद्धव से कहते हैं:

na tathā me priya-tama

ātma-yonir na śaṅkaraḥ

na ca saṅkarṣaṇo na śrīr

naivātmā ca yathā bhavān

"न तो भगवान ब्रह्मा, न भगवान शिव, न भगवान संकर्षण, न भाग्य की देवी, और न ही वास्तव में मेरा अपना स्व-रूप ही आपको जितना प्रिय है।" (भागवतम 11.14.15) इसी तरह भगवान नारायण दुर्वासा मुनि से कहते हैं:

nāham ātmānam āśāse

mad-bhaktaiḥ sādhubhir vinā

śriyam ātyantikīṁ vāpi

yeṣāṁ gatir ahaṁ parā

"साधु व्यक्तियों के बिना, जिनके लिए मैं एकमात्र गंतव्य हूँ, मैं अपने स्वयं के रूप या अपनी सर्वोच्च पत्नी, देवी श्री के प्रति आकर्षित नहीं होता हूँ।" (भागवतम 9.4.64) भगवान द्वारा इस तरह से बोलने का एक कारण यह है कि यद्यपि उनके शाश्वत सहयोगी—संकर्षण, महा लक्ष्मी, और इसी प्रकार के अन्य—हमेशा अडिग भक्ति में स्थापित रहते हैं, लेकिन इसे हासिल करने के लिए उन्होंने कोई कष्ट नहीं उठाया, जबकि भौतिक दुनिया में उनके "नए" भक्तों ने शुद्ध भक्ति-मार्ग को प्राप्त करने के लिए सभी आराम और सुरक्षा का त्याग किया है। ऐसे भक्तों द्वारा उठाई गई तकलीफ के लिए, भगवान कृष्ण विशेष रूप से आभारी हैं। इसके अलावा, भगवान अपने सभी भक्तों को अपने आप को और अधिक समर्पित करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं, और इसे पूरा करने के लिए वह उन भक्तों की जोरदार प्रशंसा करते हैं जैसे प्रह्लाद ने जो उनकी संतुष्टि के लिए बड़े जोखिम उठाए हैं।

कोई पूछ सकता है कि प्रह्लाद कैसे ब्रह्मा, इंद्र और अन्य देवताओं से बड़ा हो सकता है। एक ओर, देवता अक्सर भगवान विष्णु के दर्शन करने में सक्षम होते हैं, जो सभी आध्यात्मिक प्रथाओं की अंतिम पूर्णता है। दूसरी ओर, श्री प्रह्लाद भगवान के साथ ज्यादातर उन्हें याद करके ही जुड़ते हैं। हम अगले अध्याय में बृहद्-भागवतामृता (पाठ 20) में प्रह्लाद को खुद के बारे में कहते हुए सुनेंगे:

hanūmad-ādi-vat tasya

kāpi sevā kṛtāsti na

paraṁ vighnākule citte

smaraṇaṁ kriyate mayā

"मैंने कभी भी हनुमान और अन्य लोगों की तरह भगवान के लिए कोई वास्तविक सेवा नहीं की है। मैंने केवल कभी-कभी भगवान को याद किया है, जब मेरा मन परेशान था।" फिर भी, हमें याद रखना चाहिए कि प्रह्लाद वास्तव में भगवान को लगातार देखते हैं, और श्रीमद्-भागवतम (पांचवां खंड, अध्याय अठारह) के वर्णन के अनुसार प्रह्लाद हरि-वर्ष ग्रह पर भगवान को लगातार प्रार्थनाएँ अर्पित करते हैं। प्रह्लाद के पोते बलि ने भी लगातार भगवान को देखने का अधिकार उनसे विरासत में प्राप्त किया है, और इस प्रकार श्री वामनदेव बलि के साथ उनके महल में रहते हैं। यदि प्रह्लाद केवल भगवान को याद करने और उन्हें सीधे न देख पाने के लिए खुद की आलोचना करते हैं, तो वह केवल अपने आप से असंतोष है क्योंकि ऐसे परिपूर्ण वैष्णव को स्वाभाविक रूप से विनम्रता महसूस होती है। वह अपने बारे में जो कुछ भी कहते हैं, उसके बावजूद वह वैकुण्ठ में भगवान के शाश्वत सहयोगियों से भी अधिक भगवान को प्रिय हैं।

बृहद्-भागवतामृता की कुछ पांडुलिपियों में, निम्नलिखित पद्य पाठ 84 और 85 के बीच डाला गया है:

garbha-stho yady api tvat ke-

nopadeśena bhaktimān

sa jātas tad api tvaṁ ca

tasmāt sukham avāpsyasi

"माना कि जिस कारण वह विशुद्ध भक्ति से संपन्न हुए, वह यह था कि जब वह अभी भी गर्भ में थे तब आपने उन्हें कुछ निर्देश दिए थे। लेकिन फिर भी वह एक शुद्ध भक्त के रूप में पैदा हुए, और इसलिए आप भविष्य में सुख से पुरस्कृत होने के पात्र हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)