श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 3: प्रपञ्चातीत (भौतिकता से परे)  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.3.81 
पुनः पुनर् वरान् दित्सुर्
विष्णुर् मुक्तिं न याचितः
भक्तिर् एव वृता येन
प्रह्लादं तं नमाम्य् अहम्
 
 
अनुवाद
भगवान विष्णु ने कई बार प्रह्लाद को वरदान देने की कोशिश की, लेकिन उसने मुक्ति मांगने से इनकार कर दिया। इसके बजाय उसने केवल शुद्ध भक्ति को चुना। मैं उनके चरणों में नतमस्तक हूँ।
 
Lord Vishnu tried many times to grant Prahlad a boon, but he refused to seek salvation. Instead, he chose only pure devotion. I bow at his feet.
तात्पर्य
नारायण-व्युह-स्तव से उद्धृत किया गया यह छंद प्रह्लाद की भगवान के प्रति सर्वोच्च भक्ति की विशेषता को उजागर करता है। भगवान नृसिंह ने प्रह्लाद को मुक्ति के लिए प्रेरित करने हेतु हरसंभव प्रयास किया, ताकि सभी को प्रह्लाद की अडिग शुद्ध भक्ति देखने को मिले। इस अनुवाद में बताए अनुसार, "पुण: पुण:" ("बार-बार") शब्द को विभिन्न तार्किक संदर्भों में समझा जा सकता है। विचार हो सकता है कि भगवान नृसिंह ने प्रह्लाद को कई बार मुक्ति का वरदान दिया हो। या फिर प्रह्लाद ने शुद्ध भक्ति के लिए बार-बार प्रार्थना की हो। या फिर प्रह्लाद ने अपने भावी पुनर्जन्मों में शुद्ध भक्ति के लिए प्रार्थना की हो। प्रह्लाद पराशर मुनि द्वारा श्री विष्णु पुराण (1.20.38) में लिखी गई अपनी प्रार्थना में भगवान नृसिंह के सामने अंतिम विचार व्यक्त करते हैं:

नाथ योनि-सहस्रेषु

येषु येषु व्रजाम्यहं

तेषु तेषु अच्युता भक्ति

अच्युतास्तु सदा त्वयी

"हे स्वामी, मुझे इस दुनिया में जितने भी जन्म लेने हैं, हजारों जन्मों में मुझे आपके प्रति अटूट भक्ति प्रदान करें, अविनाशी भगवान।" प्रह्लाद के हजारों बार जन्म लेने की इच्छा बताती है कि उन्हें मुक्ति में कोई रुचि नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)